Saturday, September 19, 2026
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लेख/विचार

नए भारत में पुलिस की छवि की चुनौती

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस नए भारत की परिकल्पना की है, उसमें पुलिस का चेहरा बदलना बड़ी चुनौती है। समूचा देश इस वक्त महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की रोकथाम के लिए आंदोलित है। खासकर बलात्कार और हत्या के बढ़ते अपराध पुलिस के रवैये की व्यापक आलोचना का आधार बने हैं। प्रधानमंत्री ने पुणे में आयोजित देश भर के पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के 55वें वार्षिक सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया है कि महिलाओं के प्रति सुरक्षा का भाव जगाने वाली पुलिसिंग होनी चाहिए। पुलिस को अपने कामकाज और रवैये में भी बदलाव लाना चाहिए। यह एक संयोग ही है कि जिस वक्त हैदराबाद से उन्नाव तक की पुलिस कठघरे में खड़ी है, उसी वक्त पुणे में यह सम्मेलन हुआ है। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों ने पुलिस सुधार की जरूरत को रेखांकित किया है। पूरे देश के पुलिस तन्त्र में शामिल अधिकारियों, पुलिस एकेडमियों को बिना वक्त गवाएं अपनी छवि बदलने की प्रभावी पहल करनी होगी। आज के भारत में पुलिसिंग की यह मौजूदा सूरत किसी हाल में स्वीकार नहीं हो सकती है। भारत की सिविल सोसाइटी अब अपराध के खिलाफ सामूहिक तौर पर सड़क पर उतरने लगी है। वह भयमुक्त माहौल और त्वरित न्याय की उम्मीद रखती है। उसे संविधान में यह सब गारंटियां दी गई हैं। ऐसे में न सिर्फ देश के राजनीतिक तन्त्र को ही संवेदनशील होना पड़ेगा, वरन अदालतों के भी सचेत होने का यही सही वक्त है। पीड़ित का पहला वास्ता पुलिस से है और यदि पहले ही कदम पर उसे मदद की जगह दुत्कार और अपमान मिलेगा तो मुश्किलें बढ़ना तय है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पुलिस की छवि कैसी है? यह किसी से छिपा नहीं है। जिस दिन प्रधानमंत्री ने पूणे में पुलिस में सुधार की नसीहत की, ठीक उसी दिन भारत के गृह मंत्रालय की एक सर्वे रिपोर्ट ने पुलिस को आइना दिखाया है। यह सर्वे रिपोर्ट पुलिस को समग्रता के साथ सोचने के लिए अवश्य विवश करेगी।

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दोहरा चरित्र–देश, समाज, संविधान के लिए खतरा- कुसुम सिंह

अभी कुछ ही दिन हुए हैदराबाद की महिला चिकित्सक का दुर्भाग्यशाली कृतघ्न सामूहिक बलात्कार व जघन्य हत्या। बात बात पर आग उगलने वाले हैदराबाद के सांसद महोदय के मुंह से एक भी शब्द इस शर्मनाक हत्याकांड के  विरुद्ध नहीं निकला। उन्होंने न तो पीड़िता के प्रति कोई संवेदना दिखाई न पीड़ित परिवार के प्रति कोई सहानुभूति न ही अपराधियों के प्रति सख्ती दिखाई और न ही इस कुकृत्य की निंदा की।वे मूक दर्शक बनकर पूरा घटनाक्रम देखते रहे शायद आनन्दित भी होते रहे। क्यों? क्या इसलिए कि पीड़िता एक हिन्दू थी या कोई और वजह?
विडम्बना देखिए, जैसे ही हैदराबाद पुलिस द्वारा अपराधियों के एनकाउंटर की सूचना प्रसारित। हुई,वे तुरंत मुखरित हो उठे।अपराधियों के मारे जाने से व्यथित हो उठे, पुलिस की कार्यवाही को कानून के घेरे में ले लिया। प्रश्न खड़ा कर दिया, कैसे पुलिस ने अपराधियों को मार गिराया, कानून अपने हाथ में कैसे ले सकते है, तुरन्त पुलिस एनकाउंटर की विशेष जांच कराई जाए।मारे गए अपराधियों के शवों का पोस्टमार्टम कराया जाय।

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एनकाउंटर नहीं त्वरित न्याय कीजिये

भारत ‘रूल ऑफ लॉ’ से चलने वाला देश है, मगर हैदराबाद काण्ड के रेपिस्टों को पुलिस एनकाउंटर में मार गिराने के बाद जो हालात बने हैं, उसमें रूल ऑफ लॉ के पैरोकार जलालत के खतरों से जूझ रहे हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने जैसे मनोभाव जाहिर किए हैं, उसने कुछ समय के लिए बलात्कारियों का एनकाउंटर करने वाली पुलिस को हीरो बना दिया है। पुलिस पर जो फूल बरसें हैं, उनकी महक और ताजगी खत्म होते ही जन सामान्य के नथुनों में व्यवस्था की वही पुरानी सड़ांध भर जाएगी। वही भययुक्त महौल जहां बलात्कार के बाद पीड़िता की रिपोर्ट यही फूलों से नवाजी गई पुलिस नहीं लिखेगी। लिख गई तो अपराधी गिरफ्तार न होंगे और हो गए तो किसी पीड़िता को ट्रक से कुचलवा देंगे या उन्नाव की तरह जलाकर मार देंगे।
यह कोई नई बात नहीं है जब सड़ांध मारते तन्त्र से परेशान लोग अपराधियों का एनकाउंटर किए जाने की घटनाओं पर खुश हुए हैं।

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एक आवाजः समाज में बढ़ते महिला अपराधों के विरुद्ध

आज समाज में व्याप्त तमाम अपराधिक प्रवृत्तियों में सबसे ज्वलंत अपराध है महिला यौन शोषण। यह समाज की मानसिक विकृति व विक्षिप्तता की स्थिति है जो हमारे मनु स्मृति के वचन ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ पर आधारित सनातनी संस्कृति व शिक्षा पर एक बहुत बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद के आध्यात्मिक व धर्मप्रधान देश में इंसानों की पाश्विक प्रवृति क्या संकेत दे रही है?
2012 में भारत की राजधानी दिल्ली में हुआ जघन्य निर्भया आपराधिक हत्या काण्ड के दोषी आज भी दंडित नहीं हुए। भारत की लचर न्यायव्यवस्था 7 वर्ष से अधिक समय लेकर भी अपराधियों को सजा नहीं सुना पायी है। जबकि अपराधी रंगे हाथ पकड़े गए, अपराध भी कुबूल किया। किन्तु न्यायव्यवस्था न जाने किस असमंजस की स्थिति में रहती है। त्वरित निर्णय ले ही नहीं पाती। अपराध पर अपराध होते जाते हैं, न्यायव्यवस्था आंखों में पट्टी बांधे बस न्याय का तराजू हाथ में थामे मूर्तिवत खड़ा रहती है।

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कौन है महिलाओं का चौकीदार ? -अनिल अनूप

आज भारत उस मुकाम पर पहुंच चुका है जहां तीन तलाक से मुक्ति मिल चुकी है, कश्मीर में धारा 370 से मुक्ति मिल चुकी है, अयोध्या जैसी समस्या का समाधान किया जा चुका है, समान आचार संहिता लागू करने की बात की जा रही है, हम टेक्नोलॉजी की ऊंचाइयों तक पहुंच चुके हैं पर रेपिस्ट के लिए कठोर कानून, फास्ट ट्रैक अभी तक मुकर्रर नहीं, किसी केस में फांसी की सजा मुकर्रर होती भी है तो भी विलंबित हो जाती है। ऐसे में हमारा चांद पर परचम लहराना भी वृथा है जहां धरती पर ही बेटियां महफूज नहीं। शहरों की तो बात छोडि़ए, यहां देवभूमि हिमाचल में भी वहां के लोगों को आज भी भोले-भाले लोगों की संज्ञा दी जाती है, संस्कृति, भाईचारे की बात की जाती है, सुरक्षित माहौल की बात की जाती है, यहां पर भी गुडि़या रेप केस ने पूरे हिमाचल को झकझोर कर रख दिया है और आरोपी अभी तक नहीं पकड़े गए हैं। ऐसे में बेटियां कैसे महफूज रहें।

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महाराष्ट्र गेम ओवर या ‘पवार’ गेम रईस अहमद ‘लाली’

गेम ओवर हो गया। ‘पवार’ गेम के आगे महाराष्ट्र के नंबर गेम में भाजपा की यह हालत होनी ही थी। जिस तरह सत्ता पर काबिज होने के लिए उसने हक़ीकत को नज़रअंदाज कर उतावलापन दिखाया, उससे इस खेल में उसकी हार सुनिश्चित थी। बावजूद इसके उसने हर जरिये से हर हथकंडे अपनाने की कोशिश की। और, जब अंतत: कोई चारा नहीं बचा तो 80 घंटे के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को इस्तीफा देकर शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार का रास्ता साफ करना पड़ा।
अंतत: अब यह तय हो गया है कि महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनने जा रही है। और इस सरकार का नेतृत्व करेंगे शिवसेना के उद्धव ठाकरे। जाहिर है जब सरकार की सूरत साफ लग रही है, तो इस सरकार के भविष्य को लेकर बहस-मुबाहिसों का दौर भी शुरू हो गया है। बहुतों का मानना है कि बेमेल गठबंधन की यह सरकार ज्Þयादा दिनों तक चल नहीं पाएगी। कारण, एक तरफ शिवसेना जैसी हिंदुत्वादी विचारधारा वाली पार्टी है तो दूसरी तरफ एकदम विपरीत विचारधारा वाली एनसीपी, कांग्रेस जैसी पार्टियां। नितिन गडकरी समेत कई नेताओं ने कहा है कि यह अवसरवादी सरकार होगी और बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी। वहीं कई तो अब भी इस खेल में भाजपा को ही विजेता बता रहे हैं।

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क्या अब राजनीति की परिभाषा बदल गई ?

यह बात सही है कि राजनीति में अप्रत्याशित और असंभव कुछ नहीं होता, स्थाई दोस्ती या दुश्मनी जैसी कोई चीज़ नहीं होती हाँ लेकिन विचारधारा या फिर पार्टी लाइन जैसी कोई चीज़ जरूर हुआ करती थी।  कुछ समय पहले तक किसी दल या नेता की राजनैतिक धरोहर जनता की नज़र में उसकी वो छवि होती थी जो उस पार्टी की विचारधारा से बनती थी लेकिन आज की राजनीति में ऐसी बातों के लिए कोई स्थान नहीं है । आज राजनीति में स्वार्थ, सत्ता का मोह, पद का लालच, पुत्र मोह, मौका परस्ती जैसे गुणों के जरिए सत्ता प्राप्ति ही अंतिम मंज़िल बन गए हैं। शायद इसीलिए अपने लक्ष्य को हासिल करने की जल्दबाजी में ये राजनैतिक दल अपनी विचारधारा, छवि और नैतिकता तक से समझौता करने से नहीं हिचकिचाते।

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अभी कठिन है डगर मन्दिर की

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा श्रीराम मन्दिर के पक्ष में दिये गए ऐतिहासिक एवं अभूतपूर्व निर्णय के बाद 491 वर्ष से चले आ रहे विवाद का अन्त भले ही हो गया हो, परन्तु मन्दिर निर्माण पर घमासान होना अभी शेष है। शीर्ष अदालत के आदेशानुसार मन्दिर निर्माण का दायित्व केन्द्र सरकार द्वारा गठित न्यास या ट्रस्ट को सौंपा जायेगा। उसके बाद यह ट्रस्ट ही तय करेगा कि मन्दिर कब और कैसे बनेगा। इस ट्रस्ट में कौन-कौन होगा इसके लिए केन्द्र सरकार ने अन्दर ही अन्दर कवायद शुरू कर दी है। इसके साथ ही ट्रस्ट में महती भूमिका निभाने तथा मन्दिर निर्माण का श्रेय लेने के लिए विभिन्न धर्मगुरु, राजनेता तथा अनेक हिन्दू संगठन भी पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं। जिसकी परिणिति अन्ततोगत्वा एक दूसरे की टांग खिंचाई के रूप में होने की पूर्ण सम्भावना है।
गौरतलब है कि सन 1989 में रष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं ने भव्य राम मन्दिर निर्माण हेतु शिलान्यास करवाया था। इसमें गोरखनाथ मन्दिर के तत्कालीन महन्त अवैद्यनाथ की भी महती भूमिका रही थी। गोरखनाथ मन्दिर के वर्तमान महन्त मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ हैं। अतः ट्रस्ट में योगी आदित्यनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। वहीं संघ भी ट्रस्ट में अपनी विशेष भूमिका चाहेगा।

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सरदार वल्लभभाई पटेल जयंती विशेष

सरदार वल्लभभाई पटेल जिनको लौह पुरुष के रूप में जाना जाता है। चूंकि भारत के एकीकरण में सरदार पटेल का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था, इसलिए उन्हें भारत का लौह पुरूष कहा गया। इनका जन्म 31 अक्टूबर 1875 में हुआ। भारत के लौह पुरुष के साथ-साथ भारत का बिस्मार्क के रूप में भी जाना जाता हैं। इन्होंने आज़ादी के बाद विभिन्न रियासतों के एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभाई और भारत के और टुकड़े होने से बचाया हैं। सरदार  वल्लभभाई  पटेल का विचार था  की,”शक्ति के अभाव में विश्वास व्यर्थ है। विश्वास और शक्ति, दोनों किसी महान काम को करने के लिए आवश्यक हैं।”
भारत की आजादी के बाद वे प्रथम गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री बने। सरदार पटेल ने महात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। बारडोली सत्याग्रहका नेतृत्व कर रहे पटेल को सत्याग्रह की सफलता पर वहाँ की महिलाओं ने सरदार की उपाधि प्रदान की। भारतीय नागरिक सेवाओं (आई.सी.एस.) का भारतीयकरण कर इसे भारतीय प्रशासनिक सेवाएं (आई.ए.एस.) में परिवर्तित करना सरदार पटेल के प्रयासो का ही परिणाम है।

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कुर्सी का जोड़ तोड़ बनाम जनादेश !

चुनावो से ठीक पहले आर्थिक मंदी बेरोजगारी और जनवसुली योजना अर्थात महँगे यातायात चालान ने भाजपा की लुटिया डुबाई और सचेत किया होगा। हरियाणा और महाराष्ट्रा विधानसभा चुनाव परिणाम ने भाजपा को पंगु बना दिया क्योकि अब वो जेजेपी और शिवसेना के भरोसे पर ही स्थायी सरकार बना पाएगी। अब प्रश्न ये उठता है कि क्या सचमुच महाराष्ट्र व हरियाणा में 370 कमाल नहीं कर पाया ? क्या सच में गडकरी और योगी भाजपा के लिए किरकिरी बन गए है ? क्या बेरोजगारी ने भाजपा से यूपी 2022 छिन लिया है ? आइये जरा विश्लेषण करते है।
महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों राज्यों में भाजपा ने विजय जरूर प्राप्त की। महाराष्ट्र में भाजपा गठबंधन को आसानी से बहुमत प्राप्त हो गया तो हरियाणा में बहुमत से 6 कदम दुर रह गई। टीवी पर बैठे पैनेलिस्टों ने बिना चुनावी डाटा के अध्ययन किए हुए यह कहना शुरु कर दिया कि धारा-370 दोनों राज्यों में कोई मुद्दा नही बन पाया।

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