नियम कानून बनाए ही इसलिए जाते हैं कि जनजीवन सुचारु रुप से चलें लेकिन अपने निजी फायदे के चलते लोग बाग इसका सही इस्तेमाल नहीं करते। सीधे-सीधे कह सकते हैं कि दुरुपयोग करते हैं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। इन दिनों गाड़ियों पर चालन का मुद्दा गरमाया हुआ है। नियमों के पालन के लिए सख्ती जरूरी है लेकिन सख्ती के नाम पर जो गुंडागर्दी हो रही है वो कहां तक जायज है? हालांकि सोशल मीडिया पर इस बात का मजाक भी बहुत उड़ रहा है लेकिन कुछ जगहों पर ऐसी घटनाएं देखी सुनी जा रही है जहां गुंडागर्दी सरेआम घट रही है। यह कैसी बाध्यता है नियमों के पालन की? एक दायरे में रहकर नियमों का पालन करवाया जाए तो लोग भी नियमों का पालन करने के लिए बाध्य होंगे। नियमों को मनवाने के नाम पर मनचाहा चालान काट कर जनता को जिस तरह से परेशान किया जा रहा है वह गलत है। एक ओवरलोड ट्रक का चालान 2 लाख 500 रुपए काटा गया, दिल्ली में एक ट्रक का चालान 1 लाख 41 हजार 760 रूपये काटा गया, एक बाइक वाले का चालान 23000 काटा गया, एक ऑटो वाले का 59000 रुपए का चालान कटा। अभी हाल ही में 3 लाख का चालान कटा। इतनी बड़ी रकम पेनल्टी के तौर पर भरना आसान नहीं है और मिडिल क्लास के लोगों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं।
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लालच बुरी बला है
बहुत समय पहले की बात है किसी गांव में एक बुढ़िया अपने बेटे और बहू के साथ रहा करती थी। बहू का उसके प्रति व्यवहार बहुत अच्छा नहीं था। उसे उसकी मौजूदगी खटकती रहती थी। वह दिन भर बड़बड़ाती रहती,”न जाने इस बुढ़िया को कब मौत आएगी मेरी छाती का पीपल बन गई है मर जाए तो 101 नारियल चढ़ाऊंगी।” बुढ़िया यह सब सुनकर बहुत दुखी होती। अपमान का घूंट पीकर जी रही थी। आखिर इस उम्र में जाती भी तो कहां? वह मन बहलाने के लिए चरखे पर सूत काटने का काम करती और रात में जब थक जाती तो अपने चरखे को रखते हुए गुनगुनाती,” उठो चरख कुठिल पर बैठो, आते होंगे झामरइया सूते पलंग पर।”बहू को लगातार उसका साथ रहना खटक रहा था और वह इस उधेड़बुन में थी कि ऐसा क्या उपाय किया जाए जिससे हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाए। उसे एक तरकीब सूझी। उसने अपने पति के कान भरने शुरू कर दिए कि न जाने तुम्हारी मां रोज रात में किसे बुलाती है बेटे ने ऐसी किसी बात से इनकर किया तो उसने कहा यदि आपको यकीन नहीं है तो आप खुद अपने कानों से सुन लीजिएगा। रात में बुढ़िया रोजाना की तरह गुनगुना रही थी ,”उठो चरख कुठिल पर बैठो, आते होंगे झामरइया सूते पलंग पर…..।”
कहीं आने वाली मंदी का कारण हम तो नहीं बनने वाले ?
इस समय भारत ही नहीं पूरे विश्व में आर्थिक मंदी की आहट की चर्चा है। भारत के विषय में अगर बात करें तो हाल ही में जारी कुछ आंकड़ों के हवाले से यह कहा जा रहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था बेहद बुरे दौर से गुज़र रही है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार अप्रैल- जून तिमाही की आर्थिक विकास दर 5% रह गई है जो कि पिछले 6 सालों में सबसे निचले स्तर पर है। एक अर्थशास्त्री के लिए ये आंकड़े मायने रखते होंगे लेकिन एक आम आदमी तो साधरण मनोविज्ञान के नियमों पर चलता है। सरकार कह रही है कि आने वाली वैश्विक मंदी का भारत में कोई खास असर नहीं होने वाला है अपितु इसके साथ ही इस वैश्विक मंदी का असर भारत पर नहीं हो इस के लिए अनेक उपाय भी कर रही है।, लेकिन टीवी और अखबार “आने वाली” मंदी की खबरों और विभिन्न अर्थशास्त्रियों के “शस्त्रार्थ” से भरे हैं। तो सोशल मीडिया के मंच पर इस विषय में परोसे जाने वाली जानकारी से आज आम आदमी आश्वस्त होने के बजाए चिंतित एवं भ्रमित अधिक हो रहा है। जो आम आदमी कुछ सालों पहले तक देश की आर्थिक स्थिति से अनभिज्ञ अपने घर की मंदी दूर कर अपनी खुद की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में लगा रहता था आज देश की अर्थव्यवस्था पर विचार विमर्श कर रहा है।
Read More »शिक्षक का भटकता उत्तरदायित्व
प्रत्येक वर्ष के सितम्बर माह के प्रथम सप्ताह मे 5 सितम्बर को हम शिक्षक दिवस के रूप मे मनाते है। जिस महान शख्शियत के जन्मदिन को हम इस विशेष दिवस का दर्जा दिए है वो थे हमारे स्वतन्त्र भारत के उपराष्ट्रपति ड़ॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन। भारत मे गरीबी और शिक्षा जैसे विषयो पर बहुत काम हुए किन्तु उक्त विषय पर जो काम राधाकृष्णन जी ने किया वो खुद मे अद्वितीय है। आज के वर्तमान समय मे शिक्षा की जो व्यवस्था लागू है वो बेहद निराशाजनक और खेदपूर्ण है। आजकल अयोग्य को योग्य बनाकर उच्च वेतनमान पर धड़ल्ले से नियुक्त किया जा रहा जबकि योग्य संसाधन विहीन होकर दुर्गम जीवन व्यतीत कर रहा।
शिक्षा विभाग पूरी तरह जर्जर और शिक्षक पूरी तरह मानसिक अपंग हो चुके है। मैं ऐसे कई उदाहरण प्रत्यक्ष प्रमाण और किदवन्ति दे सकता हूँ जिसमे योग्य और मेहनती शिक्षक कम वेतनमान पर जीतोड़ मेहनत कर रहे और अयोग्य और लाख पचास हजार वेतन लेने वाले शिक्षक शिक्षा व्यवस्था को धाराशायी कर रहे। प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों तेजी से चरमराई है कारण शिक्षको की दबंगता और शिक्षण कार्य के पीछे नीरसता है। कई विद्यालयो मे तो शिक्षक विद्यालय खुलने के कई घण्टे बाद पहुचते है ऐसे मे अभिवाहक कैसे उस विद्यालय के प्रति आश्वस्त होकर अपने पाल्य को वहाँ पढ़ने भेजे।
आखिर गणपति विसर्जन क्यों करते हैं….
गणेशोत्सव करीब ही है। बड़े मनोयोग और श्रद्धा से लोग गणपति को घर लाते हैं। दस दिन तक विराजने वाले गणपति की पूजा आराधना करते हैं। वैसे इस उत्सव को बाल गंगाधर तिलक ने भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए और भारतीयों को एकता के सूत्र में बांधने के लिए शुरू किया था जोकि अब उत्सव के रूप में देश में कई जगहों पर बड़े उत्साह के साथ मनाया जाने लगा है। वैसे तो गणपति के विषय में बहुत सी कथाएं प्रचलित है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गणपति का विसर्जन क्यों किया जाता है? पुराणों में एक कथा प्रचलित है कि वेद व्यास जी ने गणेश चतुर्थी से महाभारत की कथा दस दिन तक लगातार सुनाई थी और इस कथा को गणेश जी ने अक्षरशः लिखा था। दस दिन बाद जब वेदव्यास जी ने आंखें खोली तो पाया कि दस दिन की अथक मेहनत से गणेश जी का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया है तो वेदव्यास जी ने तुरंत गणेश जी को एक कुंड में ले जाकर ठंडा किया। इसीलिए गणेश जी की स्थापना करके चतुर्दशी को उन्हें शीतल किया जाता है।
‘एक ही छत के नीचे हो, अब सब धर्मों की प्रार्थना’‘
अब समय आ गया है जबकि सभी धर्मों के लोगों को एक ही स्थान पर एकत्रित होकर एक ही परमपिता परमात्मा की प्रार्थना करनी चाहिए। अर्थात एक ही छत के नीचे हो-अब सब धर्मों की प्रार्थना’ हो। अज्ञानता के कारण आज एक ही परमपिता परमात्मा की ओर से युग-युग में आये अवतारों को अलग-अलग मानने के कारण ही धर्म के नाम पर चारों ओर जमकर दूरियां बढ़ रही है, जबकि सभी अवतार एक ही परमपिता परमात्मा की ओर से युग-युग में आये हैं। इस प्रकार हम सब एक ही परमात्मा की संतानें हैं। लैटिन भाषा में रिलीजन के मायने जोड़ना होता है। अर्थात जो जोड़े वह धर्म है तथा जो तोड़े वह अधर्म है। रामायण में तुलसीदास जी ने ठीक ही लिखा है कि ‘जब जब होई धर्म की हानि – बाढ़हि असुर, अधम अभिमानी। तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा – हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।। अर्थात जब-जब धर्म की हानि होती है और संसार में असुर, अधर्म एवं अन्यायी प्रवृत्तियों के लोगों की संख्या सज्जनों की तुलना में बढ़ जाने के कारण धरती का संतुलन बिगड़ जाता है, तब-तब परम पिता परमात्मा कृपा करके धरती पर अपने प्रतिनिधियों (अवतारों) कृष्ण, बुद्ध, अब्राहीम, मुसा, महावीर, जरस्थु, ईसा, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह आदि को मानवता का मार्गदर्शन कर समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए युग-युग में विविध रूपों में भेजते रहे हैं।
निर्दोष कानूनी प्रक्रिया से साबित होते हैं प्रेस कांफ्रेंस से नहीं
“गैरों में कहाँ दम था हमें तो अपनों ने लूटा, हमारी कशती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था।“
आज कांग्रेस के दिग्गज नेता और देश के पूर्व वित्तमंत्री चिदंबरम सीबीआई की हिरासत में कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे। क्योंकि 2007 के एक मामले में जब वे 2019 में गिरफ्तार होते हैं तो उसी के बयान के आधार पर जिसकी मदद करने का उनपर आरोप है। जी हाँ वो “इंद्राणी मुखर्जी” जो आज अपनी ही बेटी की हत्या के आरोप में जेल में हैं अगर इंद्राणी मुखर्जी आज जेल में नहीं होतीं तो भी क्या वो सरकारी गवाह बनतीं? जवाब हम सभी जानते हैं और शायद यह खेल जो खुल तो 2007 में ही गया था बोफ़ोर्स घोटाले, 2जी घोटाले, यूटीआइ घोटाले, ताज कॉरिडोर घोटाले, यूरिया घोटाले एयरबस घोटाले, स्टैम्प पेपर घोटाले जैसे अनेक घोटालों की ही तरह सबूतों और गवाहों के अभाव में कागजों में ही दफन हो जाता। चिदंबरम दोषी हैं या नहीं ये फैसला तो न्यायालय करेगा लेकिन खुद एक वकील होने के बावजूद उनका खुद को बचाने के लिए कानून से भागने की कोशिश करना, सीबीआई के लिए अपने घर का दरवाजा नहीं खोलना, उन्हें गिरफ्तार करने के लिए सीबीआई के अफसरों का उनसे घर की दीवार फांद कर अंदर जानासमझ से परे है।
कश्मीर अभी इम्तिहान आगे और भी है।
कश्मीर में “कुछ बड़ा होने वाला है” के सस्पेंस से आखिर पर्दा उठ ही गया। राष्ट्रपति के एक हस्ताक्षर ने उस ऐतिहासिक भूल को सुधार दिया जिसके बहाने पाक सालों से वहां आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने में सफल होता रहा लेकिन यह समझ से परे है कि कश्मीर के राजनैतिक दलों के महबूबा मुफ्ती फ़ारूख़ अब्दुल्ला सरीखे नेता और कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष जो कल तक यह कहता था कि कश्मीर समस्या का हल सैन्य कार्यवाही नहीं है बल्कि राजनैतिक है, वो मोदी सरकार के इस राजनीतक हल को क्यों पचा पा रहे हैं। शायद इसलिए कि मोदी सरकार के इस कदम से कश्मीर में अब इनकी राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं बची है। लेकिन क्या यह सब इतना आसान था ? घरेलू मोर्चे पर भले ही मोदी सरकार ने इसके संवैधानिक कानूनी राजनैतिक आंतरिक सुरक्षा और विपक्ष समेत लागभग हर पक्ष को साधकर अपनी कूटनीतिक सफलता का परिचय दिया है लेकिन अभी इम्तिहान आगे और भी है।
शिक्षा की नीतियाँ शिक्षकों को बनाने दें – डॉ. दीपकुमार शुक्ल
व्यापक अर्थ में शिक्षा व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यक्तित्व को विकसित करने वाली एक सतत एवं सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया के तहत व्यक्ति समाज में वयस्क की भूमिका निभाने के योग्य बन पाता है। शिक्षा शब्द शिक्ष धातु से बना है। जिसका अर्थ होता है सीखना और सिखाना। सीखने सिखाने की प्रक्रिया व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक अनवरत चलती रहती है। अनेक विद्वानों का यह भी मत है कि गर्भस्थ शिशु भी माँ के माध्यम से ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करता है। इसकी प्रामाणिकता के लिए प्रायः लोग अभिमन्यु का उदाहरण देते हैं। गर्भवती स्त्रियों को महापुरुषों की कथाएँ तथा सदविचार सुनाने की परम्परा भारतवर्ष में प्राचीन काल से रही है। जिसका उद्देश्य गर्भस्थ शिशु में सदविचारों का प्रत्यारोपण करना होता था। जन्म के पूर्व से मृत्यपर्यन्त चलने वाली शिक्षा प्रक्रिया के इस व्यापक स्वरूप को किसी भी मनुष्य की जन्मजात शक्तियों के विकास, उसके ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि तथा व्यवहार में परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। इससे पृथक शिक्षा प्रक्रिया का एक संकुचित स्वरूप भी है। जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को एक निश्चित समय व स्थान (विद्यालय आदि) पर सुनियोजित ढंग से एक निश्चित पाठ्यक्रम तथा निश्चित प्रक्रिया के तहत शिक्षित किया जाता है। परीक्षा उत्तीर्ण करके प्रमाण-पत्र प्राप्त करना इस प्रक्रिया का प्रमुख उद्देश्य होता है।
ट्रिपल तलक आस्था नही, अधिकारों की लड़ाई है
ट्रिपल तलाक पर रोक लगाने का बिल लोकसभा से तीसरी बार पारित होने के बाद एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में ही इसे असंवैधानिक करार दे दिया था लेकिन इसे एक कानून का रूप लेने के लिए अभी और कितना इंतज़ार करना होगा यह तो समय ही बताएगा। क्योंकि बीजेपी सरकार भले ही अकेले अपने दम पर इस बिल को लोकसभा में 82 के मुकाबले 303 वोटों से पास कराने में आसानी से सफल हो गई हो लेकिन इस बिल के प्रति विपक्षी दलों के रवैये को देखते हुए इसे राज्यसभा से पास कराना ही उसके लिए असली चुनौती है। यह वाकई में समझ से परे है कि कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष अपनी गलतियों से कुछ भी सीखने को तैयार क्यों नहीं है। अपनी वोटबैंक की राजनीति की एकतरफा सोच में विपक्षी दल इतने अंधे हो गए हैं कि यह भी नहीं देख पा रहे कि उनके इस रवैये से उनका दोहरा आचरण ही देश के सामने आ रहा है। क्योंकि जो विपक्षी दल राम मंदिर और सबरीमाला जैसे मुद्दों पर यह कहते हैं कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है और उसके फैसले को स्वीकार करने की बातें करते हैं वो ट्रिपल तलाक पर उसी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध खड़े हो कर उसे चुनौती दे रहे हैं।
Jansaamna