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विविधा

प्राणायाम के पूर्व आवश्यक है यम, नियम और आसन की सिद्धि डॉ. दीपकुमार शुक्ल

2017.06.28 04 ravijansaamnaबीते 21 जून को विश्व के 180 से भी अधिक देशों में तीसरा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। भारत की धरती पर हजारों वर्ष पूर्व प्रस्फुटित, पुष्पित एवं पल्लवित हुए योगज्ञान के प्रति आज पूरे विश्व में उत्साह दिखायी दे रहा है। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की अप्रतिम पहल के परिणामस्वरूप ही यह सम्भव हो पाया है। भारतीय ऋषियों ने योग का मानव जीवन के साथ अटूट सम्बन्ध देखकर मनुष्य को योगमय जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी थी। ऋषि-महर्षियों ने आत्मकल्याण और लोककल्याण के सन्मार्ग का अनुसन्धान समाधिस्थ अवस्था में योगारूढ़ होकर ही किया था। वेद, शास्त्र, उपनिषद, पुराण, गीता आदि धर्मग्रन्थ योगदर्शन के अनेकानेक चमत्कारों से आच्छादित हैं। योगज्ञान का ग्रन्थ रूप में संकलन इस बात की स्वतः पुष्टि है कि हमारे ऋषि-मुनि इस ज्ञान को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहे परन्तु भौतिक प्रगति की घुड़दौड़ में शामिल रहने वाले अनेक राजा-महराजाओं और बादशाहों द्वारा जहाँ इस ज्ञान की उपेक्षा की गयी वहीँ कट्टर मुस्लिम और अंग्रेजी शासकों द्वारा इस ज्ञान का मजाक उड़ाते हुए इसे पद्द्वलित करने का भी बारम्बार प्रयास किया गया। इसके बावजूद भी भारत के विभिन्न मनीषियों द्वारा सीमित संसाधनो के माध्यम से इस दिव्य और लोकोपयोगी ज्ञान को सुरक्षित रखा गया। इनमें से अनेक मनीषी ऐसे हैं जिनका नाम हममे से शायद ही किसी को ज्ञात हो।

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समीर

क्यूँ समीर तू रुका हुआ है छोड़ सभी बांधा मग में।
मुझको भी गतिवान बना तू तीव्र चलूँ उजले पथ में।
क्यूँ समीर …………..
मंद मंद शीतलता से तू शीतल राहे कर देता।
निज स्वभाव को इस जीवन में थोड़ा सा ही भर देता।
क्यूँ समीर…………….
सरसर की मृदु ध्वनियों से तू सांसो की साँस बढ़ा देता।
सदृश तेरे मैं भी हो जाऊ अंतर का सुख दे देता।
क्यूँ सम…………….
तरु पल्लव में गति भरता तू जीव जंतु में भरता प्राण।
मंद मंद सुख सबको दे तू तन मन हर्षित कर देता।
क्यों समीर……………..

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हास्य-व्यंग्य : हमें गर्व है कि हम गधे हैं……..

2017.03.06.1 ssp adeep shukal23 फरवरी के बाद से जंगल के राजा की नीद उड़ी हुई थी। अपने प्रकृति निर्मित आवास के शयनकक्ष में आज सुबह से ही इधर से उधर चक्कर पे चक्कर मारे जा रहे थे। दो, तीन बार बाहर भी झाँक आये थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रहे हों। बच्चों के साथ छू-छू खेल रही महारानी तिरछी निगाहों से बड़ी देर से उन्हें निहार रही थीं। आखिर उन्होंने पूंछ ही लिया “क्या बात है प्राणनाथ, बड़े परेशान दिखायी दे रहे हो? क्या किसी ने आपकी गैरत को ललकारा है जो इतने व्यग्र हो रहे हो, मुझे आदेश दीजिये प्राणेश्वर, कौन है गुस्ताख, मै एक ही पंजे से उसके प्राण पखेरू कर दूंगी”। चेहरे पर परेशानी का भाव लिये महाराज ने महारानी की ओर देखा और बोले “नहीं ऐसा कुछ भी नहीं करना है महारानी, कोई विशेष बात नहीं है। गजराज को बुलाया है, उनके आने के बाद ही कुछ सोचूंगा“ , “ऐसा क्या है जो आप मुझे नहीं बताना चाहते हैं ?” महारानी के इतना पूंछते ही दरबान लकड़बग्घा आ गया और सर झुकाकर बोला “महाराज की जय हो, महामन्त्री गजराज पधारे हैं, आपका दर्शन चाहते हैं, सेवक के लिए क्या आदेश है महाराज” , “ठीक है उन्हें अन्दर भेज दो“, “जो आज्ञा महाराज“ कहते हुए लकड़बग्घा चला गया। थोड़ी देर में गजराज आ गये उन्होंने महाराज का अभिवादन किया “आओ गजराज आओ, बड़ी देर कर दी आने में“, “कुछ नहीं महाराज, दरअसल हमारे पड़ोस में बनबिलार और बन्दर में सुबह-सुबह विवाद हो गया था, बस उन्हीं को शान्त कराने के चक्कर में थोड़ी देर हो गई” , “अच्छा-अच्छा, निपट गया, क्यों लड़ गये थे दोनों ?”, “कुछ नहीं महाराज, बस यूँ ही गधे के चक्कर में…….”, “ग..ग..ग..गधे के चक्कर में“ कहते हुए महराज को जैसे चक्कर आ गया हो।

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मैं स्त्री हूँ

अनगिनत भावों केlalitakarmchandani
मिश्रण से बनी
सृष्टि की सबसे अनमोल रचना
सृष्टि की प्रतीक हूं मैं
कहीं सर्द कही ऊष्ण
कहीं ठोस कही नम
कहीं तम कही प्रकाश
कहीं जल कही थल
कहीं अश्रु कही मुस्कान
कहीं उर्वर कही शुष्क
कहीं श्वेत कही श्याम
कहीं जन्मदायिनी कही संहारक
कहीं बिंदु कही अनंत
कहीं धरती कही अन्तरिक्ष
हाँ सृष्टि ही तो हूँ मैं
-ललिता करमचंदानी

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” आया फिर से एक साल नया “

kanchan-pathakपतझड़ फागुन सावन गुज़रा
ऋतुओं से भरा मौसम गुजरा
जीवन का मतलब समझा कर
एक वर्ष पुराना बन गुजरा
अज्ञात दिशा की भूमि पर
आरोहण करने काल नया
उम्मीद का नन्दनवन लेकर
आया फिर से एक साल नया

झिलमिल आशा की जुगनू से
संशय का कोहरा झांक रहा
अपनों की बस्ती में सहमा
मन अर्थ समय के आंक रहा
सागर हीं सागर फैला है
नदिया सिमटी हीं जाती है
रिश्तों के भीड़ भरे तट पर
नीरवता क्रन्दन गाती है
लहर भँवर संग बीन रहा मिल
धुप छाँव का जाल नया
आया फिर से एक साल नया 

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राजगुरु की कुण्डलियाँ

( आचार्य शिवप्रसादसिंह राजभर ‘‘राजगुरु’’, सिहोरा, जबलपुर )

सेवक से मालगुजार
सेवक बन सेवा करूं, झुक-झुक मांगी वोट ।
लेकिन अब यह कर रहा, जनता पर ही चोट ।।
जनता पर ही चोट, ले रहा वेतन भारी ।
हमें झुकाता फिरे, गजब की कारगुजारी ।।
‘‘राजगुरू’’ सब लील, रहा ये जनता के हक ।
बनता मालगुजार, किया था भरती सेवक ।।

नये सामन्त
घूमत देखे सड़क पर, नये गिद्ध, नव काग ।
लज्जित हो छुप गए कुछ, गये शहर से भाग ।।
शहर छोड़़ गे भाग, न ढूंढ़े मिलें पुराने ।
छीना सकल स्वभाव, हड़प के ठौर ठिकाने ।।
‘‘राजगुरू’’ पा वरद, हस्त कर रहे हुकूमत ।
सांसत सरल स्वभाव, देखते इनको घूमत ।।

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छप्पन इन्ची वक्ष

छप्पन इन्ची वक्ष

मोदी मोदी रट रहा, मिलकर सकल विपक्ष।
लेकिन जिद छोड़े नहीं, छप्पन इन्ची वक्ष।।
छप्पन इन्ची वक्ष, नहीं वह झुके झुकाये।
कैसे बचे बजूद, विपक्षी सब पगलाये।।
बची-खुची थी साख, विपक्षी-दल सब खो दी।
राम राम ज्यों जपें, ‘‘राजगुरु’’ मोदी मोदी।।

राजनीति का निम्न स्तर
सकल विपक्षी दल हुए, अब इतने लहलीट। (बे-शरम)
सेना को मुद्दा बना, लगे बचाने सीट।।
लगे बचाने सीट, सु-श्री ममता बौराई।
कहती पूछे बिना कुमुक तैनात कराइ्र्र।।
समझे दूजा देष, ‘‘राजगुरु’’ गायब अकल।
निम्न स्तर पर उतरे, विपक्ष के नेता सकल।ं

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भूलकर किसी और…..

nutan-jyotiभूलकर किसी और दुनिया में जो तुम खो गए
बैठ कर मेरी छांव में ही आँख मूँद जो सो गए।

हूँ पुराना मूल और आधार हूँ मैं आपका
छोड़ मुझको राहों में नई राह के तुम हो गए।

देखो झर झर झर रही है केंचुली मेरे अंग की
ओढ़ कर ये नया लबादा चैन से तुम सो गए।

आओगे मेरे पास तुम तुमको गले लगाऊंगी
चाहे मुझको छोड़कर तुम और के जो हो गए।

है बहुत तन्हा सी गमगीन दुनिया ये मेरी
आ गए जो गोद में तुम उजले अंधेरे हो गए।

पढ़ लूँ तुमको मैं या तुम पढ़ लो जो मुझको बैठकर
अब तो दोनों दोनों के ही साये से बस हो गए।

हूँ कोई पन्ना पुराना मैं गली किताब का
लफ्ज जैसे तुम जो आये पन्ने करारे हो गए।

Written by : Nutan Jyoti

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दुविधा नदी को भारी है……

2016-10-14-4-sspjs-alkaदुविधा नदी को भारी है, सागर का पानी खारी है
डरती जाती, बहती जाती, क्या करे, बेचारी नारी है
बेबस मन की हलचल है, लहर नहीं ये धड़कन है
तड़प रही है मिलने को, मिलने में भी तड़पन है
मंजिल मेरी सागर है, मन में यह उच्चारी है
दुविधा नदी को भारी है………
बंधन तट के दोनों ओर, और नहीं है कोई ठौर
सागर में ही मिल जायेगी, नदी रही है ये ही सोच
मंजिल अपनी सागर करली, राहों में ही वो हारी है
दुविधा नदी को भारी है…………..

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छा गया जेहन पर

nutan-aछा गया जेहन पर सुन्दर सा जो ये अक्स है
सिर्फ साया है किसी का या कोई सख्श है।

बुला रहा जो दूर से ही कर इशारे मुझे
है आसमाँ का चाँद या थाली में कोई अक्स है।

दिख रही है खूबसूरत आज फिर ये जमीं
जो जमीं पर छा रहा वो आसमाँ का अक्स है।

बज रही है मन की वीणा तार भी झंकृत हुए
सोच कर बस साथ मेँ जो किसी का अक्स है।

भूलकर सब जो जमीं नभ से है जा मिली
दिख रही है कुछ अलग कुछ अलग सा अक्स है।

तन भी सुंदर मन भी सुंदर सुंदर समां ये हो गया
छा रहा उस पर जो आज सुंदर सा ये अक्स है।

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