विश्व बंधु शास्त्री: बागपत। उत्तर प्रदेश में बागपत की पहचान लंबे समय तक गन्ने की खेती, किसान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जुझारू संस्कृति से जुड़ी रही है। अब इस पहचान में एक और अध्याय तेजी से जुड़ रहा है, और वह है बागपत के युवाओं की प्रतिभा। ट्यौढ़ी के अमन कुमार डिजिटल नवाचार और युवा नेतृत्व के जरिए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचे, खेकड़ा की रेणुका पंवार की आवाज देशभर में गूंजी, धनौरा के राहुल प्रजापति ने हृदय प्रत्यारोपण के बाद विश्व ट्रांसप्लांट गेम्स में पदक जीतकर मिसाल कायम की, बरनावा की नैंसी त्यागी अपने हाथों से तैयार परिधान में कान्स के रेड कार्पेट तक पहुंचीं और खेकड़ा के सचिन यादव ने जैवलिन रिकॉर्ड कायम किया। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर बागपत की यह तस्वीर इसलिए खास है क्योंकि इन युवाओं के रास्ते अलग हैं, क्षेत्र अलग हैं और संघर्ष भी अलग। लेकिन मंजिल एक जैसी है। अपने दम पर पहचान बनाना और बागपत का नाम जिले की सीमाओं से बाहर ले जाना।
लाखों युवाओं की राह रोशन कर रहे अमन, देश के टॉप यूथ आइकॉन में शामिल
कभी साइकिल पर गांव-गांव अखबार बांटकर पढ़ाई करने वाले ट्यौढ़ी के युवा अमन कुमार ने वही अखबार पढ़ते हुए सरकारी योजनाओं और अवसरों की जानकारी पाई और यहीं से तय किया कि कोई युवा सूचना के अभाव में पीछे न रहे। इस मिशन के लिए माय भारत, बागपत प्रशासन सहित विभिन्न संस्थानों के साथ कार्य कर लाखों युवाओं को अवसरों, कार्यक्रमों एवं योजनाओं से जोड़ा। यूपी सरकार के सर्वोच्च युवा सम्मान स्वामी विवेकानंद स्टेट यूथ अवॉर्ड से सम्मानित होकर जिले का नाम रोशन किया। आज अमन कुमार देश के टॉप यूथ आइकॉन में शामिल हैं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व के विभिन्न संस्थानों से जुड़े हैं। प्रधानमंत्री के समक्ष टीम यूपी के कैप्टन से लेकर यूनेस्को के मिशन से जुड़ने तक, आज अमन लाखों युवाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहे हैं। उनके कार्यों को नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने भी सराहा है।
खेकड़ा की आवाज, जिसने हरियाणवी संगीत को घर-घर पहुंचाया
बागपत के खेकड़ा की रेणुका पंवार ने संगीत के क्षेत्र में जिले को अलग पहचान दिलाई। कम उम्र में गायन शुरू करने वाली रेणुका को 52 गज का दामन से देशभर में व्यापक लोकप्रियता मिली। उनके गीतों ने क्षेत्रीय हरियाणवी संगीत को डिजिटल दौर में नई पहुंच दी। रेणुका की कहानी की खासियत यह है कि उन्होंने अपनी पहचान किसी बड़े महानगर से नहीं, बल्कि खेकड़ा जैसे छोटे कस्बे से बनानी शुरू की। उनकी आवाज ने क्षेत्रीय संगीत की सीमाएं पार कीं और सोशल मीडिया के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंच बनाई। बागपत की बेटी की आवाज ने यह दिखाया कि स्थानीय बोली और लोकधुन भी राष्ट्रीय लोकप्रियता हासिल कर सकती है।
हृदय प्रत्यारोपण के बाद राहुल ने जीते पदक
धनौरा के राहुल प्रजापति की कहानी उपलब्धि से पहले जिंदगी की दूसरी पारी की कहानी है। हृदय प्रत्यारोपण के बाद सामान्य जीवन में लौटना अपने आप में बड़ी चुनौती थी, लेकिन राहुल ने खेल को अपनी नई जिंदगी का हिस्सा बनाया। 2025 में जर्मनी के ड्रेसडेन में आयोजित वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में उन्होंने बैडमिंटन डबल्स में कांस्य पदक जीता। राहुल की उपलब्धि खेल पदक से आगे जाती है। उन्होंने यह संदेश दिया कि अंग प्रत्यारोपण के बाद जीवन रुकता नहीं है। सही हौसले और अभ्यास के साथ वही जीवन खेल के अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकता है।
बरनावा की बेटी ने सिलाई मशीन से कान्स तक लिखी कहानी
बागपत के बरनावा गांव की नैंसी त्यागी ने फैशन को सिर्फ पहनावे की नहीं, अपनी पहचान बनाने की कला बना दिया। यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली पहुंचीं नैंसी ने कंटेंट क्रिएशन और अपने हाथों से कपड़े तैयार करने की शुरुआत की। इसके बाद उनकी बनाई पोशाकें सोशल मीडिया पर चर्चा में आने लगीं। 2024 में कान्स फिल्म फेस्टिवल के रेड कार्पेट पर उनका गुलाबी गाउन सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। यह किसी बड़े फैशन हाउस की पोशाक नहीं थी, बल्कि नैंसी ने खुद इसे तैयार किया था। कान्स में उनका दूसरा लुक भी उनके हाथों से तैयार साड़ी थी। बरनावा से कान्स तक पहुंची नैंसी की कहानी ने बागपत की बेटियों के लिए संभावनाओं का दायरा भी बड़ा किया। उनका मानना है, प्रतिभा के लिए मंच कहीं भी हो सकता है, शुरुआत अपने कमरे की सिलाई मशीन से भी हो सकती है।
क्रिकेट का सपना छोड़ा, भाले ने पहुंचाया विश्व मंच तक
खेकड़ा के सचिन यादव की कहानी भी बदलाव की मिसाल है। उनका शुरुआती रुझान क्रिकेट की ओर था। बाद में उनकी शारीरिक क्षमता और खेल प्रतिभा को देखते हुए उन्हें जैवलिन की ओर बढ़ने की सलाह मिली। गांव और खेतों से शुरू हुई मेहनत ने उन्हें राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से होते हुए विश्व मंच तक पहुंचाया। 2025 में उन्होंने एशियाई चैंपियनशिप में रजत पदक जीता। इसके बाद टोक्यो में आयोजित विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 86.27 मीटर के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ पुरुष जैवलिन फाइनल में चौथा स्थान हासिल किया। वह पदक से कुछ ही दूरी पर रह गए, लेकिन इस प्रदर्शन ने उन्हें विश्व जैवलिन के शीर्ष खिलाड़ियों के बीच ला खड़ा किया।
अमन के हाथ में तकनीक और नवाचार है। रेणुका की पहचान आवाज है। राहुल ने जिंदगी की दूसरी पारी को खेल में बदला। नैंसी ने सुई-धागे को वैश्विक फैशन मंच तक पहुंचाया और सचिन ने भाले को बागपत की नई खेल पहचान बना दिया। इन पांचों की उपलब्धियां एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। यही इस कहानी की सबसे बड़ी खूबसूरती है। बागपत का युवा अब किसी एक क्षेत्र में अपनी पहचान तक सीमित नहीं है। कहीं डिजिटल नवाचार है, कहीं कला और संगीत, कहीं फैशन और उद्यमशीलता, कहीं खेल की विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा और कहीं जीवन की कठिन परिस्थितियों को चुनौती देकर नई शुरुआत। बागपत में गन्ने की खेती आज भी अर्थव्यवस्था और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन जिले के युवाओं की उपलब्धियां बता रही हैं कि बागपत की मिट्टी सिर्फ गन्ना ही नहीं, प्रतिभा भी उगा रही है। यहां का युवा खेत से खेल मैदान तक जा रहा है, गांव से कान्स पहुंच रहा है, खेकड़ा की आवाज डिजिटल दुनिया में गूंज रही है और ट्यौढ़ी का युवा वैश्विक मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस की भावना भी यही है कि युवाओं को उनकी परिस्थितियों से नहीं, उनकी संभावनाओं से देखा जाए। किसी के पास संसाधन ज्यादा हैं, किसी के पास कम; किसी की शुरुआत गांव से है, किसी की शहर से। लेकिन सपने, मेहनत और आगे बढ़ने की इच्छा सीमाओं से बड़ी होती है। बागपत के इन युवाओं की कहानियां इसी बदलती तस्वीर को सामने रखती हैं।
Jansaamna