उत्तर प्रदेश में सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर योगी सरकार द्वारा अनेक दावे किये जाते हैं। जैसे कभी कायाकल्प की तस्वीर दिखाई जाती है, कभी स्मार्ट कक्षाओं और सुविधाओं का ढिंढोरा पीटा जाता है, तो कभी नामाँकन बढ़ने को उपलब्धि बताकर अपनी पीठ थपथपाई जाती है। लेकिन, असली सवाल आज भी वहीं खड़ा है कि, ‘सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को क्या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है ?’
यदि जवाब संतोषजनक नहीं है तो फिर करोड़ों रुपये खर्च करने और योजनाओं की लम्बी सूची गिनाने और ढिंढोरा पीटने का औचित्य क्या है ? शिक्षा का स्तर क्यों दिनों दिन गिरता जा रहा है ?
जमीनी हकीकत यह है कि आम अभिभावक, जो आर्थिक रूप से बहुत सक्षम नहीं है, वह भी अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजने के लिये मजबूर हो रहा है। उसे मालूम है कि, ‘निजी विद्यालयों की भारीभरकम फीस देनी पड़ेगी, कमीशन का लेप लगाकर तैयार की गई किताबें-कॉपी खरीदनी होंगी, ड्रेस और अन्य खर्चों का बोझ लादा जाया जायेगा।’ यह सबकुछ जानने के बावजूद अभिभावक यह मानकर अपनी मेहनत का पैसा खर्च कर रहा है कि, ‘निजी विद्यालय में कम से कम उसके बच्चे को बेहतर शिक्षा मिल सकेगी।’
यह स्थिति सरकारी शिक्षा व्यवस्था की सफलता नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर जनता के घटते भरोसे का सबसे बड़ा प्रमाण है।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात तब होती है, जब भी सरकारी विद्यालयों की कमियों पर सवाल उठाये जाते हैं और जवाब में पिछली सरकारों की खामियाँ गिनाने लगते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि, ‘आखिर कब तक वर्तमान की असफलताओं का ठीकरा अतीत के सिर फोड़ा जाता रहेगा ?’
सूबे की जनता ने सपा, बसपा, काँग्रेस आदि….पिछली सरकारों के इतिहास का हिसाब सुनाने के लिये नहीं, बल्कि वर्तमान को बेहतर बनाने के लिये नई सरकार को चुना है। यदि आज भी समस्या पूर्ववत् बनी हुई है तो उसका समाधान करना वर्तमान शासन और व्यवस्था की जिम्मेदारी है। दूसरों की गलतियां गिनाकर अपनी नाकामी को छुपाया नहीं किया जा सकता!
सरकारी विद्यालय केवल गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों के लिये शिक्षा का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक समानता की सबसे मजबूत बुनियाद हैं। जब सरकारी विद्यालय कमजोर होते हैं तो सबसे ज्यादा नुकसान उस परिवार का होता है जो महंगे निजी विद्यालय का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि, ‘शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक असमानता और गहरी होती जा रही है।’
यह कटु सत्य है कि, ‘सिर्फ भवनों की रंगाई-पुताई, फर्नीचर, स्मार्ट टीवी अथवा आकर्षक योजनाओं से शिक्षा का स्तर नहीं सुधरता।’ मिड-डे-मील, किताबे और पोशाक, फ्री में दे देने से शिक्षा का स्तर नहीं सुधर रहा है। बल्कि इनमें भी भ्रष्टाचार का लेप लगा दिखाई दे रहा है।
शिक्षा व्यवस्था की आत्मा, एक जिम्मेदार शिक्षक और उसकी जवाबदेही है। अतएव सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता, नियमित उपस्थिति, पढ़ाई के प्रति जिम्मेदारी, बच्चों की बुनियादी समझ की निरन्तर जाँच और कमजोर विद्यार्थियों के लिये विशेष व्यवस्था आवश्यक है। केवल कागजों पर प्रगति दिखाकर शिक्षा की गुणवत्ता नहीं बढ़ाई जा सकती।
सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे किसी भी मायने में निजी विद्यालयों के बच्चों से कम प्रतिभाशाली नहीं हैं। अन्तर यदि है तो अवसर, संसाधन और व्यवस्था का है। जिस बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, उचित मार्गदर्शन और पढ़ाई का अनुकूल वातावरण मिलेगा, वह निश्चित रूप से आगे बढ़ेगा। इसलिए यह तर्क देना कि सरकारी विद्यालयों के बच्चे ही कमजोर हैं, व्यवस्था की अपनी जिम्मेदारी से बचने का आसान रास्ता है।
अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता को आंकड़ों और सरकारी विज्ञापनों के चश्मे से नहीं, बल्कि कक्षा के भीतर जाकर देखा जाये। कितने बच्चे अपनी कक्षा के स्तर की किताब पढ़ पा रहे हैं ? कितने बच्चे सामान्य गणित कर पा रहे हैं ? कितने विद्यार्थी विषय को समझकर उत्तर दे पा रहे हैं ? शिक्षक, कहीं सिर्फ औपचारिकता तो नहीं निभा रहे हैं और हाजिरी दिखाकर अपना वेतन पक्का कर रहे हैं! इन सवालों के ईमानदार जवाब ही शिक्षा व्यवस्था की असली तस्वीर सामने ला सकते हैं।
योगी सरकार को यह समझना होगा कि, ‘शिक्षा पर खर्च कोई बोझ नहीं, बल्कि देश और समाज के भविष्य में निवेश है।’ आधुनिक सड़कें और भवन कुछ वर्षों में फिर बन सकते हैं, लेकिन किसी बच्चे के जीवन से निकल गया शैक्षिक अवसर वापस नहीं लौटता। यह एक कड़ुआ सच है कि, ‘एक कमजोर शिक्षा व्यवस्था आने वाली पीढ़ियों को कमजोर कर देती है!’
इसलिए अब बहानों, आँकड़ों और पिछली सरकारों के उदाहरणों को देना छोड़िये और आम जनता को सार्थक परिणाम दीजिये। सरकारी विद्यालयों में ऐसी शिक्षा चाहिए जिस पर गरीब से गरीब अभिभावक के बच्चे का भविष्य उज्ज्वल हो सके और उसे अपने बच्चे के उज्जवल भविष्य के लिये निजी विद्यालय का दरवाजा खटखटाने को मजबूर न होना पड़े। स्मरण रहे कि, ‘सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल विभागीय लक्ष्य नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व है।’ यदि योगी सरकार वास्तव में प्रदेश के भविष्य को मजबूत करना चाहती है तो उसे सरकारी विद्यालयों की गिरती शिक्षा व्यवस्था पर कठोरता से ध्यान देना होगा। क्योंकि कमजोर विद्यालय केवल कमजोर विद्यार्थी नहीं तैयार करते, वे कमजोर समाज और कमजोर राष्ट्र की नींव रखते हैं।
अब सवाल यह नहीं कि, ‘पिछली सरकारों ने क्या किया या क्या नहीं किया।’ सवाल यह है कि वर्तमान की योगी सरकार, शिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु ऐसा कौन सा ठोस कदम उठा रही है, जिसके सार्थक परिणाम जमीन पर दिखाई देंगे और आम जन गर्व से यह कह सकेंगे कि मेरा बच्चा भी सरकारी विद्यालय में अच्छी शिक्षा पा रहा है।
-श्याम सिंह पंवार
Jansaamna