Tuesday, October 27, 2026
Breaking News
Home » लेख/विचार » “जिन्दगी, जरा ठहर जा!”

“जिन्दगी, जरा ठहर जा!”

लम्हे-लम्हे, पल-पल जीवन गुजर रहा है
जाने ये कब से सतत, चल रहा है
साँसे आती है, जाती है, गुजर जाती है
सीना इस आग में, कब से सुलग रहा है?
कभी फकीरी में भी, मौज थी अपनी
जिधर देखो उधर, अपनो की फैज थी
यहाँ भीड़ बहुत है, मगर उसमें हम नही
ये जीवन का सफर, अकेले चल रहा है।
तितलियों की मस्ती, मकरंद की बस्ती
खुसबू, जैसे फूलों की चुरा रहा है
चिड़ियों का करलाव, आसमान की लाली
मन जैसे ऊंची उड़ान को मचल रहा है ।
नदियों सा बहना, एक दिशा में अनवरत
जीवन ऐ निर्मल जल सा, चल रहा है
बस ठहर जा, पल कुछ घड़ी ये जिन्दगी
ये जीवन का उन्माद कुछ पिघल रहा है।
कुछ आनंद छुपा है, फिजाओं में यहाँ
उसे खोजने की ख्वाहिश, ये मन कर रहा है
जी लेने दे कुछ लम्हे, हमे भी रुककर
कुछ तो दुनिया में, अच्छा चल रहा है।

  • श्याम कुमार कोलारे ( छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश )