Friday, September 18, 2026
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पहले खुद को बदलो फिर सरकार को कोसों

आजकल सोशल मीडिया पर सरकार को कोसने का रिवाज़ चल रहा है, जो लोग खुद का घर तक ठीक से नहीं चला पाते वो भी इतनी बड़ी आबादी को जो सरकार बखूबी चलाकर उपर उठाने की कोशिश कर रही है उनको गालियां देने से नहीं चूकते। सबको बहुत चिंता हो रही है देश की, सबको लगता है बहुत विकट स्थिति से गुज़र रहा है देश। पर ज़रा देश वालों के गिरहबान में झांक कर देखते है की हम सब देश को उपर उठाने में और आर्थिक स्थिति को सुधारने में अपना योगदान कितना देते है।
पेट्रोल डिज़ल के दामों में एक रुपये का बढ़ना सबको अख़रता है अपने निजी खर्चों को देखिए वहाँ महंगाई क्यूँ आड़े नहीं आती? मार्केट में निकलें तब पता चलता है, गाड़ियों के शोरूम पर जाईये, नए मॉडल्स पे वेटिंग चल रही है , ग्राहकों को 6-6महीने तक गाड़ियों का इंतज़ार करना पड़ रहा है । रेस्टोरेंट में खाली टेबल नहीं मिल रही है , लाइन लगी रहती है। शॉपिंग मॉल में पार्किंग की जगह नहीं है इतनी भीड़ है। सिनेमा हॉल भी अच्छा खासा बिज़नस कर रहे हैं।
कई मोबाइल कंपनियों के मॉडल आउट ऑफ स्टॉक हैं , एप्पल लांच होते हुए ही आउट ऑफ स्टॉक हो जा रहा है। ऑनलाइन शॉपिंग के दौर में भी वर्किंग डे में भी शाम को बाजारों में पैर रखने को जगह नहीं है , ऑनलाइन शॉपिंग इंडस्ट्री में धूम मची है। मगर लोगों का कहना है कि पट्रोल १ रुपया बढ़ने से ऊनकी कमर टूट गई है। घर में जब बेमतलब की लाइटें जलती रहती हैं, पंखा चलता रहता है, टीवी चलता रहता है तब मुझे कोई तकलीफ नहीं होती पर बिजली का दाम दस पैसे बढ़ते ही लोगों की अंतरात्मा कराह उठती है।
खुद के बच्चें अठ्ठारह डिग्री पर एसी चलाकर कम्बल ओढ़कर सोते हैं तब हम कुछ नहीं बोल पाते लेकिन बिजली का रेट बढ़ते ही मेरा पारा चढ़ जाताहै। गीजर चौबीसों घंटे ऑन रहता है तब हमें कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन बिजली का रेट बढ़ते ही मिर्ची लग जाती है। कामवाली या घरवाली कुकिंग गैस बर्बाद करती है तब जुबान नहीं हिलती लेकिन गैस का दाम बढ़ते ही मेरी ज़ुबान कैंची हो जाती है। या रेड लाइट पर कार का इंजन बन्द करना मुझे गँवारा नहीं, घर से दो गली दूर दूध लेने मैं गाड़ी से जाता हूँ, वीकेंड में मैं बेमतलब भी दस बीस किलोमीटर गाड़ी चला लेता हूँ लेकिन अगर पेट्रोल का दाम एक रूपया बढ़ जाए तो भँवे तन जाती है।
एक रात दो हज़ार का डिनर खाने में हमें तकलीफ नहीं होती लेकिन बीस- पचास रुपए की पार्किंग फीस मुझे बहुत चुभती है। मॉल में दस हज़ार की शॉपिंग पर मैं एक रूपया भी नहीं छुड़ा पाता लेकिन हरी सब्जी के ठेले वाले से मोलभाव किए बगैर हमें खाना ही नहीं पचता। तनख्वाह रीविजन के लिए हम रोज़ कोसते है सरकार को, लेकिन कामवाली की तनख्वाह बढ़ाने की बात सुनते बीपी बढ़ जाता है।
बच्चें बात नहीं सुनते, कोई बात नहीं लेकिन प्रधानमंत्री नहीं सुनते तो हम उन गालियों की बारिश कर देते है। हम आज़ाद देश के आज़ाद नागरिक जो ठहरे किसीको भी कुछ भी सुनाने का पूरा हक है। अगले चुनाव में सरकार बदल देंगे लेकिन खुद को बदल नहीं सकते। रोज़ सरकार को कोसूंगा और वोट वाले दिन घर पर आराम करूंगा। यह जानते हुए कि वोटरों की एक बड़ी लाइन लगी है। मुझे क्या लेना देना मुझे तो सरकार को कोसना है।
अरे पहले खुद का घर ठीक से चलाईये, बदलने की शुरुआत खुद से करिए। देश सिर्फ़ सरकार का नहीं हमारा भी है, जितना हो सके अपना योगदान दें। फिर सरकार को कोसिए।
और हाँ फिलहाल सत्ता पर जो सरकार है पहले उनका पर्याय ढूँढिए, उनके अच्छे कामों पर भी गौर कीजिए, सिर्फ़ महंगाई ही एक मुद्दा नहीं देश के अन्य मुद्दों पर भी सोचिए जिस पर इस सरकार का नियंत्रण है। बाद में परिवर्तन का सोचिए। इनको खो दिया तो किसी माय के लाल में दम नहीं इस देश को बखूबी चलाने का। देश अनाथ हो जाएगा और एक बार फिर दुनिया के नक्शे में भारत दब जाएगा, और हर कोई उठाकर पत्थर मारकर निकल जाएगा। सिर्फ़ अपनी नहीं पूरे देश की फ़िक्र करो और देश को आगे ले जाने में अपना योगदान दो तभी देश उपर उठ पाएगा।
भावना ठाकर ‘भावु’ (बेंगुलूरु, कर्नाटक)