उपन्यास सम्राट प्रेमचंद भारतीय साहित्य संस्कृति की अस्मिता के प्रतीक थे । वे आधुनिक कहानी के पितामह थे। एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे।उनके साहित्य में साधारण जन की पीड़ा,समस्याओं का मार्मिक वर्णन अपने साहित्य सृजन के माध्यम से बड़े ही न्याय पूर्ण ढंग से किया ।उनका साहित्य जन समुदाय के समुद्र में हिलोरों से प्रभावित ही नहीं करता बल्कि साहित्य जगत में अपने अनोखे नए अंदाज में पढ़े-लिखे वर्ग को जागृत करने का नव मार्ग दिखाने का महान् कार्य किया है जो भारतीय हिंदी साहित्य की विरासत के रूप में आज भी प्रासंगिक है और आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता है।उनका साहित्य प्रकाश स्तंभ की तरह है जो मानवीय जीवन की सामाजिक, धार्मिक ,आर्थिक ,राजनीतिक ,सांस्कृतिक क्षेत्र में रूढ़िवादी, अंधविश्वासी, शोषण ,अन्याय जैसी बुराइयों को खत्म करने का कार्य करता है तथा नव मार्ग को प्रशस्त करता है। प्रेमचंद एक आधुनिक हिंदी कहानी के पितामह,उपन्यासकार, कुशल संपादक, संवेदनशील लेखक, जागरूक नागरिक, आदर्श एवं यथार्थ के हिमायती ,कुशल वक्ता, कलम के सिपाही थे।कहा जाता है उनकी कहानियां हिंदी साहित्य में मील का पत्थर है।साहित्य के क्षेत्र में कबीर,सूर और तुलसी की तरह प्रेमचंद ने भी जनमानस में आधुनिक साहित्य के रूप में जगह बनाई थी। प्रेमचंद साहित्य के हीरो के रूप में जन-जन के दिलों में आज भी बसे हुए हैं।उन्होंने साहित्य के माध्यम से जनमानस में यथार्थ, आदर्श एवं नैतिक न्याय व सीख से बदलाव की मीठी नदी की जलधारा बहाइ जो आज भी और आने वाले समय में भी अमृत पान कराती रहेगी। जीवन में साधारण से साधारण रहकर भी उन्होंने अपनी विचारधारा को लेखनी के माध्यम से जो असाधारण कार्य किया वह आज भी साहित्य जगत में अविस्मरणीय है। प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के लमही गांव में 31 जुलाई 1880 को हुआ था। गांव की संस्कृति उन्हें विरासत में मिली थी। ग्रामीण जीवन को उन्होंने निकटता से देखा था। 7 वर्ष की अवस्था में अपनी मां को खो दिया था। 14 वर्ष के थे तब पिता को। बचपन अभावों एवं कठिनाइयों में गुजरा था। संघर्ष ही मनुष्य को एक सच्चा इंसान बनाता है। एक साहित्यकार के संघर्ष से संवेदनाएं जन्म लेती है। प्रेमचंद की रचनाओं में मार्मिकता भी है और आम जनता की व्यथा भी है और उनके प्रति गहरी संवेदना भी। प्रेमचंद की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू में हुई थी। उन्होंने 1919 में बीए किया था। वे अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करना चाहते थे किंतु आर्थिक विषम हालात की वजह से ऐसा नहीं कर पाए। उनका विवाह 15 वर्ष की अवस्था में हो गया था किंतु वे पत्नी से असंतुष्ट थे।उन्होंने 1905 ई. में पत्नी को त्याग दिया था और 1916 में बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया था जो बहुत ही व्यवहार कुशल और बुद्धिमती थी। प्रेमचंद जी का साहित्यिक सफर 1901 में प्रारंभ हो चुका था। प्रारंभिक काल में वे उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखते थे।प्रेमचंद जी के शुरुआती दौर में राष्ट्रवाद का प्रभाव था तो बाद में आदर्श एवं यथार्थवाद का और जीवन में अंतिम पड़ाव में प्रगतिशील विचारों के साथ पूंजीपति महाजनी सभ्यता के विरोधी स्वर में उनकी लेखनी को हम पाते हैं। उन्होंने 1907 से 1915 तक उर्दू में कहानी लेखन किया।प्रेमचंद के अनुसार प्रथम कहानी 1960 में दुनिया का सबसे ‘अनमोल रतन’ प्रकाशित हुई थी जो देशभक्ति से ओतप्रोत थी। जिसमें उन्होंने लिखा-” खून का यह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।” प्रेमचंद का प्रथम कहानी संग्रह 1908 में ‘सोजे वतन'(राष्ट्र का विलाप) प्रकाशित हुआ जो राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत था। जिसे अंग्रेज सरकार ने जप्त कर लिया और प्रतियां जला दी। उनको अंग्रेज सरकार द्वारा लेखन हेतु बाध्य किया गया और मनाही की गई। तब ‘जमाना’ पत्रिका के संपादक दयानारायण निगम ने उन्हें ‘प्रेमचंद’ नाम दिया। ‘कलम के सिपाही’ नाम उनके पुत्र प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतराय ने दिया था।प्रेमचंद्र नाम से उनकी प्रथम कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ “जमाना” पत्रिका के दिसंबर 1910 के अंक में प्रकाशित हुई थी। उन्होंने उर्दू में लगभग 178 कहानियां लिखी थी जो 13 कहानी संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई। उन्होंने हिंदी में लिखना 1915 में प्रारंभ किया था इससे पूर्व में वे उर्दू में लिखते थे। प्रेमचंद की हिंदी में प्रथम कहानी “परीक्षा” 1914 में ‘प्रताप’ साहित्यिक पत्र में छपी थी। उनकी “सौत” कहानी दिसंबर 1915 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उनकी कहानियों में घटना प्रधान थी बाद में आदर्शमूलक समाधान किया इसके बाद यथार्थ और की ओर अग्रसर हुए उनकी कहानियों में घटना प्रधान,चरित्र प्रधान एवं भाव प्रधान तीनों रूपों में देखा जाता है। कहानियां विविध शैलियों में तथा अनेक समस्याओं को लेकर लिखी गई। उन्होंने अपने जीवन काल में 300 से अधिक कहानियां लिखी थी। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र में फैली बुराइयों पर व्यंग किया तो आदर्श ,यथार्थ और नैतिक न्याय की जोरदार वकालत की। उनकी एक कहानी नमक का दारोगा में हम देख सकते हैं जिनमें उन्होंने भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी पर कितना करारा व्यंग्य किया है और वह कहानी आज भी उतनी सार्थकता को बयान करती है। उनकी लेखनी आज भी प्रासंगिक है।जिसमें नमक का दारोगा बंशीधर के पिता की सीख के माध्यम से वे कहते हैं- “नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूंढना, जहां कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है,जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय तो बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।”विश्व विख्यात कालजयी साहित्यकार: प्रेमचंद
उपन्यास सम्राट प्रेमचंद भारतीय साहित्य संस्कृति की अस्मिता के प्रतीक थे । वे आधुनिक कहानी के पितामह थे। एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे।उनके साहित्य में साधारण जन की पीड़ा,समस्याओं का मार्मिक वर्णन अपने साहित्य सृजन के माध्यम से बड़े ही न्याय पूर्ण ढंग से किया ।उनका साहित्य जन समुदाय के समुद्र में हिलोरों से प्रभावित ही नहीं करता बल्कि साहित्य जगत में अपने अनोखे नए अंदाज में पढ़े-लिखे वर्ग को जागृत करने का नव मार्ग दिखाने का महान् कार्य किया है जो भारतीय हिंदी साहित्य की विरासत के रूप में आज भी प्रासंगिक है और आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता है।उनका साहित्य प्रकाश स्तंभ की तरह है जो मानवीय जीवन की सामाजिक, धार्मिक ,आर्थिक ,राजनीतिक ,सांस्कृतिक क्षेत्र में रूढ़िवादी, अंधविश्वासी, शोषण ,अन्याय जैसी बुराइयों को खत्म करने का कार्य करता है तथा नव मार्ग को प्रशस्त करता है। प्रेमचंद एक आधुनिक हिंदी कहानी के पितामह,उपन्यासकार, कुशल संपादक, संवेदनशील लेखक, जागरूक नागरिक, आदर्श एवं यथार्थ के हिमायती ,कुशल वक्ता, कलम के सिपाही थे।कहा जाता है उनकी कहानियां हिंदी साहित्य में मील का पत्थर है।साहित्य के क्षेत्र में कबीर,सूर और तुलसी की तरह प्रेमचंद ने भी जनमानस में आधुनिक साहित्य के रूप में जगह बनाई थी। प्रेमचंद साहित्य के हीरो के रूप में जन-जन के दिलों में आज भी बसे हुए हैं।उन्होंने साहित्य के माध्यम से जनमानस में यथार्थ, आदर्श एवं नैतिक न्याय व सीख से बदलाव की मीठी नदी की जलधारा बहाइ जो आज भी और आने वाले समय में भी अमृत पान कराती रहेगी। जीवन में साधारण से साधारण रहकर भी उन्होंने अपनी विचारधारा को लेखनी के माध्यम से जो असाधारण कार्य किया वह आज भी साहित्य जगत में अविस्मरणीय है। प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के लमही गांव में 31 जुलाई 1880 को हुआ था। गांव की संस्कृति उन्हें विरासत में मिली थी। ग्रामीण जीवन को उन्होंने निकटता से देखा था। 7 वर्ष की अवस्था में अपनी मां को खो दिया था। 14 वर्ष के थे तब पिता को। बचपन अभावों एवं कठिनाइयों में गुजरा था। संघर्ष ही मनुष्य को एक सच्चा इंसान बनाता है। एक साहित्यकार के संघर्ष से संवेदनाएं जन्म लेती है। प्रेमचंद की रचनाओं में मार्मिकता भी है और आम जनता की व्यथा भी है और उनके प्रति गहरी संवेदना भी। प्रेमचंद की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू में हुई थी। उन्होंने 1919 में बीए किया था। वे अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करना चाहते थे किंतु आर्थिक विषम हालात की वजह से ऐसा नहीं कर पाए। उनका विवाह 15 वर्ष की अवस्था में हो गया था किंतु वे पत्नी से असंतुष्ट थे।उन्होंने 1905 ई. में पत्नी को त्याग दिया था और 1916 में बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया था जो बहुत ही व्यवहार कुशल और बुद्धिमती थी। प्रेमचंद जी का साहित्यिक सफर 1901 में प्रारंभ हो चुका था। प्रारंभिक काल में वे उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखते थे।प्रेमचंद जी के शुरुआती दौर में राष्ट्रवाद का प्रभाव था तो बाद में आदर्श एवं यथार्थवाद का और जीवन में अंतिम पड़ाव में प्रगतिशील विचारों के साथ पूंजीपति महाजनी सभ्यता के विरोधी स्वर में उनकी लेखनी को हम पाते हैं। उन्होंने 1907 से 1915 तक उर्दू में कहानी लेखन किया।प्रेमचंद के अनुसार प्रथम कहानी 1960 में दुनिया का सबसे ‘अनमोल रतन’ प्रकाशित हुई थी जो देशभक्ति से ओतप्रोत थी। जिसमें उन्होंने लिखा-” खून का यह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।” प्रेमचंद का प्रथम कहानी संग्रह 1908 में ‘सोजे वतन'(राष्ट्र का विलाप) प्रकाशित हुआ जो राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत था। जिसे अंग्रेज सरकार ने जप्त कर लिया और प्रतियां जला दी। उनको अंग्रेज सरकार द्वारा लेखन हेतु बाध्य किया गया और मनाही की गई। तब ‘जमाना’ पत्रिका के संपादक दयानारायण निगम ने उन्हें ‘प्रेमचंद’ नाम दिया। ‘कलम के सिपाही’ नाम उनके पुत्र प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतराय ने दिया था।प्रेमचंद्र नाम से उनकी प्रथम कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ “जमाना” पत्रिका के दिसंबर 1910 के अंक में प्रकाशित हुई थी। उन्होंने उर्दू में लगभग 178 कहानियां लिखी थी जो 13 कहानी संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई। उन्होंने हिंदी में लिखना 1915 में प्रारंभ किया था इससे पूर्व में वे उर्दू में लिखते थे। प्रेमचंद की हिंदी में प्रथम कहानी “परीक्षा” 1914 में ‘प्रताप’ साहित्यिक पत्र में छपी थी। उनकी “सौत” कहानी दिसंबर 1915 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उनकी कहानियों में घटना प्रधान थी बाद में आदर्शमूलक समाधान किया इसके बाद यथार्थ और की ओर अग्रसर हुए उनकी कहानियों में घटना प्रधान,चरित्र प्रधान एवं भाव प्रधान तीनों रूपों में देखा जाता है। कहानियां विविध शैलियों में तथा अनेक समस्याओं को लेकर लिखी गई। उन्होंने अपने जीवन काल में 300 से अधिक कहानियां लिखी थी। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र में फैली बुराइयों पर व्यंग किया तो आदर्श ,यथार्थ और नैतिक न्याय की जोरदार वकालत की। उनकी एक कहानी नमक का दारोगा में हम देख सकते हैं जिनमें उन्होंने भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी पर कितना करारा व्यंग्य किया है और वह कहानी आज भी उतनी सार्थकता को बयान करती है। उनकी लेखनी आज भी प्रासंगिक है।जिसमें नमक का दारोगा बंशीधर के पिता की सीख के माध्यम से वे कहते हैं- “नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूंढना, जहां कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है,जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय तो बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।”
Jansaamna
कानपुर।
कानपुर।
२६ जुलाई को जिनकी पुण्य तिथि है ,उन नीरा आर्य को शत शत नमन।५ मार्च १९०२ को उत्तर प्रदेश के मेरठ के खेकड़ा गांव में कुलीन जाट परिवार में जन्मी थी। माता– पिता की बीमारी के कारण बहुत कर्ज होने की वजह से सारी मिल्कियत साहूकारी द्वारा कुर्क कर ली गई और अपने छोटे भाई बसंत कुमार साथ दर दर भटक ने की नौबत आ गई।इसी भटकन के दौरान हरियाणा के सेठ छज्जूमल मिले जो बड़े व्यापारी थे और वैश्य समाज में उनका बहुत बड़ा नाम था।वैसे वह खुद हरियाणवी जाट समाज से थे।छज्जूराम दानवीर और देशभक्त थे।उन्हों ने दोनों भाई–बहन को गोद ले लिया और अच्छे से लालन पालन करने लगे।कलकत्ता में उनका बहुत बड़ा कारोबार था और वे पक्के आर्यसमाजी भी थे।वीर भगतसिंह भी एकबार पुलिस से छिपते हुए उनके वहां महीना भर रहे थे।सेठजी ने नीरा का ब्याह श्रीकांत जयरंजन दास जो शिक्षित और धनवान भी थे।किंतु वह ब्रिटिश खुफिया विभाग में अफसर थे ये उनकी जानकारी में नहीं आया था।बाद में जब नीरा को पता लगा उनका पति देशद्रोही हैं और अंग्रेजो के तलवे चाट ने वाला गुलाम हैं तो वह बहुत दुखी हुई।पहले उसे राजा महेंद्र प्रताप और बाद में सुभाष चंद्र बोस की जासूसी में अंग्रेजो ने लगा रखा था।जब नीरा ने आवाज उठाई कि देशद्रोह का काम छोड़ ने के लिए कहा तो उसे कहा गया कि उनको वहां से जितना पैसा मिलता हैं उससे उनकी आने वाली कई पीढ़ियां बिना कमाए ही ऐश करेगी।तब देश भक्ति में रंगी नीरा ने पति का साथ छोड़ चले जाने की बात कही तो जवाब मिला कि पैसे हैं तो पत्नियां बहुत मिल जायेगी।और नीरा छज्जूरामजी के घर लौट आई।
फिरोजाबाद।
फिरोजाबाद।