Friday, April 26, 2019
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सम्पादकीय

पृथ्वी का बदलता स्वरूप

portal head web news2भारत देश ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व, पृथ्वी और उसके पर्यावरण की सुरक्षा हेतु विचाररत है, इसी लिए संकल्पबद्ध होकर पिछले 47 सालों से निरन्तर 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाता चला आ रहा है। यह स्मरण रहे कि वर्ष 1970 में पहली बार पूरी दुनिया ने पृथ्वी दिवस का शुभारम्भ एक अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के पर्यावरण संरक्षण के लिये किये गए प्रयासों को समर्थन देने के उद्देश्य से किया था। तब से जैसे यह एक विश्व परम्परा बन गई है और पृथ्वी दिवस ने हर देश के एक वार्षिक आयोजन का रूप ले लिया है। पर्यावरण की रक्षा के लिये भारत सहित कई देशों में कानून भी बनाए गए हैं, जिससे विभिन्न पर्यावरणीय असन्तुलनों पर काबू पाया जा सके। लेकिन पर्यावरण में प्रदूषण की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। क्योंकि पृथ्वी दिवस के सफल आयोजनों के बावजूद भी विश्व के औसत तामपान में हुई 1.5 डिग्री की वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने और अन्धाधुन्ध विकास कार्यों और पेट्रोल, डीजल तथा गैसों के अधिक इस्तेमाल के कारण काॅर्बन उत्सर्जन की बढ़ोत्तरी, ग्लेशियरों के पिघलाव और असन्तुलित भयंकर बाढ़ों और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाओं ने पृथ्वी का स्वरूप ही बदल दिया है। इससे लगता है कि पर्यावरण का सन्तुलन बिगड़ रहा है और यह विकराल रूप ले सकता है।

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चिकित्सा क्षेत्र में सेवाभाव कैसे…?

portal head web news2डाक्टरों को धरती का भगवान माना जाता है और उनका क्षेत्र यानीकि चिकित्सा क्षेत्र सेवा का क्षेत्र कहा जाता है। लेकिन यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि चिकित्सा का क्षेत्र अब सेवा का नहीं बल्कि व्यापार का क्षेत्र बन चुका है, बने भी क्योंकि ना…? सवाल मेरे मन में उठा कि जब लाखों रूपये खर्च कर डाक्टरी की पढ़ाई की है तो डाक्टर बनने वालों का शायद यही पहला उद्देश्य रहेगा कि पहले लागत को क्यों ना वसूला जाये…? इसके बाद समाजसेवा कर ली जायेगी।
वहीं हमारे देश के ज्यादातर अभिभावकों की चाह भी यही होती है कि मेरे बेटे या बेटी अच्छी शिक्षा पाये और अच्छा धन कमाये, इसीलिए वो अपनी सन्तानों को शिक्षित करने के लिए भारी भरकम रकम खर्च करते हैं। और जब भारी भरकम रकम खर्च कर डिग्री ली जायेगी तो फिर उसके बाद सेवा भाव करने की बात महज एक बेमानी ही कही जायेगी। जो लोग डाक्टर बन जाते हैं चाहे वो सरकारी अस्पताल में स्थान पायें या निजी अस्पताल खोलें उनका पहला उद्ेश्य यही रहता कि जो खर्च किया गया है उसे कमाया जाये। इसलिए उनमें चिकित्सा क्षेत्र में सेवा भाव नहीं बल्कि व्यापार पहले दिखता है।

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प्राथमिक शिक्षा में सुधार की जरूरत

portal head web news2उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद सरकारी महकमों में हलचल देखी जा सकती है। लेकिन यह कबतक चलती रहेगी इस पर कुछ कहना उचित नहीं। हां, इतना तो जरूर है कि सरकारी महकमें में योगी चर्चा अवश्य सुनी जा सकती है। इसका दूरगामी परिणाम क्या मिलेगा इसपर भी कुछ कहना जल्दवाजी होगी, फिर भी अभी तक जो हुआ उस पर कुछ नहीं कहना उचित नहीं समझता लेकिन स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग, स्कूली शिक्षा को रोजगारोन्मुख और गुणवत्तापरक बनाने के लिए योगी जी को कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है। क्योंकि जगजाहिर है कि सरकारी प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा का स्तर बहुत गिर चुका है। अगर हमारी नौननिहाल पीढ़ी को सही शिक्षा नहीं मिलेगी तो अच्छे भविष्य की कल्पना काल्पनिक ही रहेगी। वहीं युवाओं को शिक्षित, रोजगार लायक और प्रतिस्पर्धी बनाने के उद्देश्य से माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के व्यवसायिक घटक को जमीनी स्तर पर कार्यान्वित करने की महती आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा अभियान सिर्फ कागजों या दीवारों के विज्ञापन मात्र बनकर रह गए हैं। इसमें शिक्षित और रोजगार लायक युवाओं के बीच के अंतर को भरने, माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वालों की दर कम करने और उच्चतर स्तर पर शिक्षण के दबाव को कम करने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

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सरकारी मशीनरी के पुराने ढर्रे में बदलाव लायें योगी

portal head web news2देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए। सभी प्रदेशों की सरकारें बन गईं लेकिन उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिले प्रचण्ड बहुमत ने भाजपा के सामने कई चुनौतियां भी खड़ी कर दीं हैं। ऐसा माना जाता है कि देश की राजनीति उत्तर प्रदेश से चलती है लेकिन यहां की जनता परिवर्तन करने में देर नहीं लगाती। बिगत कई उदाहरणों ने स्पष्ट कर दिया है कि यहां की जनता परिवर्तन करने में जरा भी हिचक भी नहीं रखती। भाजपा को प्रचण्ड बहुमत मिलना इसका जीता जागता उदाहरण है। पिछली सपा सरकार के कार्यकाल की अगर बात करें तो ‘काम बोलता है’ को पूरी तरह से नकारते हुए सूबे की जनता ने मोदी में अपनी रूचि दिखाई और अनुमान से अधिक सीटों पर विजयश्री का आशीर्वाद जनता ने दिया। अबकी बार के चुनाव नतीजों पर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि मोदी ने भावनात्मक बयार को फैलाते हुए सूबे की जनता को अपने विश्वास में लिया और अखिलेश व राहुल के गठबन्धन की धज्जियां उड़ा दीं। कहने का मतलब है कि सूबे की जनता धार्मिकता को ज्यादा पसन्द करती है, शायद इसी लिए पार्टी के चर्चित चेहरों को जो मुख्यमंत्री की दौड़ में आगे दिख रहे थे सबको किनारे करते हुए मोदी जी ने कट्टर हिन्दूवादी छवि रखने वाले योगी जी को सूबे की कमान सौंप दी है। हालांकि पार्टी में सन्तुलन साधने के लिए दो उपमुख्यमंत्री भी बनाये गए, वहीं मन्त्रिमण्डल में भी जातीय सन्तुलन को ध्यान में रखा गया।

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मुद्दों से भटकती राजनीति

JAN SAAMNA PORTAL HEADदेश के पांच राज्यों में विधान सभा चुनावों में अपनी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए राजनैतिक दलों की नैतिकता पर प्रश्नचिन्ह लगता दिख रहा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना तो दिख ही रही है लेकिन विकास के मुद्दों से भटकते हुए भी सभी दल दिख रहे हैं। चुनावी रैलियों में हो रही भाषणवाजी से तो यही जाहिर हो रहा है कि नेताओं को विकास की बात करते हुए शायद अपनी कुर्सी पक्की नहीं नजर आ रही बल्कि अपशब्दों व बेमतलब के बयानों को पेश कर जनता के दिलोदिमाग को भटाकाने का प्रयास करने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे। बेमतलब की बयानवाजी राज्यस्तरीय नेता ही नहीं कर रहे बल्कि देश के प्रधानमंत्री जी भी कर रहे हैं।
विकास के मुद्दों को दरकिनार कर सपा-कांग्रेस गठबन्धन के प्रचारक नेताओं के साथ ही बसपा, भाजपा सहित सभी दलों के प्रचारक ऐसे शब्दों का प्रयोग कर एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि अब विकास का नहीं बल्कि बकवास का दौर चल रहा है। हद तो यहांतक हो गई है कि अब पशुओं के नामों को लेकर बयानवाजी कर नेताओं ने अपनी भाषा की सीमायें ही लांघ दी हैं। वहीं जाति-वर्ग की राजनीति करने से भी नेता जी अपना मौका नहीं गवाना चाह रहे हैं।

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अफसरों व नेताओं का अदृश्य गठबंधन!

JAN SAAMNA PORTAL HEADरियल स्टेट के क्षेत्र में अफसरों व नेताओं के अदृश्य गठबन्धन से भ्रष्टाचार नहीं रूक पा रहा है, फिर चाहे कितनों की जान चली जाये। हादसा होने के बाद वही पुराना राग उच्चाधिकारियों द्वारा अलाप दिया जाता है कि दोषियों पर जांच कर कड़ी कार्रवाई होगी और सफेदपोशों द्वारा घड़ियाली आंसू बहा दिए जाते हैं। सांत्वना व सहायता के नाम पर कुछेक कागज के टुकड़े उन परिवारों के सामने फेंक दिये जाते हैं जिनके लिए उनका अपना इस दुनियां से असमय ही अलविदा कर चुका होता है। उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर की बात करें तो यहां नेताओं व अफसरों के अदृश्य गठबन्धन से रियल स्टेट के क्षेत्र में भरपूर भ्रष्टाचार पनपा है और भ्रष्टाचार उन लोगों की बलि ले रहा है जो मजबूरी में अपनों का पेट पालने व दो जून की रोजी रोटी की तलाश में अपना खून पसीना बहाते हैं।
महानगर में लोगों का आवासीय सपना पूरा करने के लिए जहां कानपुर विकास प्राधिकरण का एक अपना महत्वपूर्ण स्थान है तो दूसरी ओर धनाड्य लोग भी औने पौने में निजी लोगों की जमीने हथियाकर आवासीय सपना पूरा करने का दम भरते हैं। वहीं बाहुबली लोग शहरी क्षेत्र में ऐसी जमीनों पर अपनी गि( दृष्टि जमाए रहते हैं जिनपर किसी भी तरकीब से अपना कब्जा जमाना उनका पहला लक्ष्य होता है और इसके बाद उस पर जल्द से जल्द निर्माण कर देते हैं। अब निर्माण अगर जल्दवाजी में किया जायेगा तो यह मुमकिन है कि मानकों का पालन करना संभव नही होगा और इसे संभव करने में सरकारी मशीनरी भी साथ देती है।

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आ गया चरणवंदगी का दौर

उत्तर प्रदेश सहित अन्य चार राज्यों में चुनावी बिगुल बज चुका है और सभी दलों ने दांव पेंच आजमाना शुरू कर दिया है। जनता का विश्वास पाने के लिए भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस सहित सभी दलों के नेताओं ने अपने अपने खासमखासों को वोट बटोरने की जिम्मेदारी देनी शुरू कर दी है। सदन की कुर्सियों पर नेताओं की निगाहें टिक गई हैं और उनके सपनों में अब विजयश्री ही दिख रही है। वर्तमान में अगर गौर करें तो नेताओं को एक भिखारी में भी भगवान दिखने लगे हैं। जिनसे नेताजी चरणवन्दगी करवाते रहे हैं उनके सामने आते ही ऐसे चरणों में गिर रहे हैं मानों उन्हें वही भगवान के दर्शन हो रहे हैं जिनकी उन्हें तलाश थी। नजारों को देखकर ऐसा लगने लगा है कि पांचवें साल में चरणवंदगी का दौर फिर आ गया है।
वहीं क्षेत्रीय प्रत्याशियों द्वारा वोटरों को लुभाने के लिए प्रलोभनों का दौर भी गुपचुप तरीके से चालू करवा दिया गया है। हालांकि सभी दलों के घोषणा पत्रों के द्वारा भी चुनावी समय में प्रलोभन दिए जाने की प्रथा है लेकिन नतीजे आने के बाद वही घोषणा पत्रों को दफना दिया जाता है और जनता को उनके खुद के भरोसे छोड़ दिया जाता है, हालांकि इसके जिए जन प्रतिनिधि कहलाने वाले कम दोषी हैं क्योंकि चुनाव जीतने वाले नेताओं से उनके द्वारा किए गए वादों का हिसाब किताब जनता खुद नहीं रखती है और न ही जवाब लेने के लिए वह नेताओं को कुरेदना चाहती है। चाहे यूं कहें कि आम जन को अपनी रोजी रोटी की तलाश करने के अलावा अन्य कार्यों के लिए समय ही नहीं बचता।

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नोटबंदी का फैसला साहसिक

जब से 500 व 1000 के पुराने नोट बन्द कर नए नोट चलाने की घोषणा प्रधानमंत्री द्वारा की गई है, तब से हर ओर इसी प्रकरण की चर्चा आम है। कोई प्रधान मंत्री के इस फैसले की आलोचना कर रहा है तो कोई उनके फैसले की सराहना करते नहीं थकता। हालांकि आम जन की बात करें तो परेशानी का सामना करते हुए भी प्रधानमंत्री जी के फैसले का स्वागत करने वालों की संख्या ज्यादा है। आम जन का कहना है है कि मोदी का कदम तो अच्छा है लेकिन व्यवस्थाओं में पूरी तैयारी न होने से परेशान होना पड़ रहा है। हालांकि जिन लोगों ने अकूत धन इकट्ठा कर लिया है वो उसे खपाने की जुगत में लगे हैं और जिनके पास कुछ ही धन है वो बैंकों में जमा करने व बदलवाने में प्रयासरत है। वहीं विपक्ष की बात करें तो वह केन्द्र सरकार को घेरने की जुगाड़ में लगा है लेकिन आम जन का सहयोग नहीं मिल रहा है इस लिए उसे मुंह की खानी पड़ रही है। पुराने नोट बन्दी के बाद से मचे हो हल्ले की सत्यता परखने के लिए मोदी जी ने नोटबंदी देश की राय जानने के लिए मोबाइल एप लांच करवाया और उसपर जो सर्वेक्षण कराया उस पर मात्र 24 घंटे के भीतर ही पाँच लाख से ज्यादा लोगों ने अपनी राय प्रकट कर दी। परिणामतः 93 प्रतिशत से अधिक लोगों ने विमुद्रीकरण का समर्थन किया है। जिसके चलते केंद्र सरकार को उत्साह मिला है और प्रधानमंत्री ने स्वयं इस परिणाम पर खुशी जताते हुए कहा कि इससे लोगों का मूड पता चलता है।

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कुनवा बना कमजोरी!

राजनीति में सबकुछ जायज कहा जाता है। किसी का चाहे अच्छा हो या बुरा लेकिन सभी अपना हित साधने की जुगत में रहते है। इसी का उदाहरण सामने देखने को मिला कि 25 वर्षों तक मुलायम सिंह यादव की सरपस्ती में जो समाजवादी कुनबा समाजवादी पार्टी की ताकत बनता रहा, वह अब पार्टी की कमजोरी बन गया है। इसका खामियाजा सपा को अगले वर्ष होने वाले विधान सभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। वर्तमान पर गौर करें तो इस समय में 2017 के विधान सभा चुनाव की तैयारी में जुटी सपा अगर बैकफुट पर नजर आ रही है तो इसकी मुख्य वजह सत्ता विरोधी लहर से अधिक परिवार का अंतर्कलह है। खास बात यह है कि सपा में बड़े से बड़ा और छोटे से छोटा नेता भी मुलायम सिंह का हर आदेश मानने की सौगंध खाते मिल जायेगा, लेकिन मुलायम की सियासत और बातों में अब वजन नहीं दिखाई पड़ता है।
चचा-भतीजे यानीकि शिवपाल-अखिलेश के मनमुटाव ने पार्टी को तार-तार कर दिया है। इसी के चलते अखिलेश के पक्ष में खड़े रहने वाले और सपा के बड़े रणनीतिकार माने जाने वाले प्रोफेसर रामगोपाल यादव सहित तमाम सपा नेताओं को शिवपाल यादव ने बाहर का रास्ता दिखा दिया तो अखिलेश यादव ने चचा शिवपाल यादव और उनके करीबी मंत्रियों को अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त करके पारिवारिक जंग को और हवा देने का काम किया। यहां तक की लखनऊ में हुए दो बड़े आयोजनों तीन नवंबर को शुरू हुई अखिलेश की समाजवादी विकास रथ यात्रा और बिगत 5 नवंबर को समाजवादी पार्टी का रजत जयंती समारोह भी इससे अछूता नहीं रह पाया। दोनों ही जगह चाचा-भतीजे और उनके समर्थक एक-दूसरे पर जोरदार तंज कसते नजर आये। शिवपाल यादव सवाल खड़ा कर रहे थे उनसे कितना त्याग लिया जायेगा शिवपाल ने जैसे ही अखिलेश को यूपी का लोकप्रिय मुख्यमंत्री कहा, पंडाल में युवाओं की नारेबाजी शुरू हो गई। शिवपाल ने गुस्से में कहा, मुझे मुख्यमंत्री नहीं बनना, कभी नहीं बनना। चाहे मेरा जितना अपमान कर लेना। बर्खास्त कर लेना। खून माँगेंगे तो दूँगा। इसके थोड़ी देर बाद भाषण देने आये मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी पूरे रौ में दिखे।

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विपदा पर एकता का परिचय दें

देश पर विपदा आने पर हम सभी को एक स्वर में सहमति देते हुए चर्चा करना चाहिए क्योंकि अगर हम अलग-अलग आवाजों में बात करेंगे तो इससे विरोधियों को मजबूती मिलने का अवसर मिलेगा। इससे एक सवाल उठता है कि क्या हमारे राजनीतिक लाभ, विचारधारा का महत्व, व्यक्तिगत नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं देश से बड़ी हो सकती हैं? पिछले उदाहरणों को मानें तो हमारे पिता, पितामह की आंखों के सामने देश विभाजित हुआ था और उस दौरान लाखों लोग मारे गए थे और एक पुरखे होने के बावजूद साम्प्रदायिक उन्माद ने देश बांटा ही नहीं बल्कि नए शत्रु पैदा कर दिए।
वर्तमान के मुद्दे की बात करें तो अगर कश्मीर जाता है तो सोचिए किसकी क्षति है? और कश्मीर में आतंकवादियों का निर्मूलन होता है तो किसकी उपलब्धि होती है? हमारे देश के बलिदानों के बारे में गहराई से सोंचिए। हम प्रायः देशभक्ति टीवी के परदे के क्षणिक अतिरेकी उत्साह में लिपटती देखते हैं। लेकिन शहीद सैनिकों के परिजनों के दर्द को न समझते हुए उनके बलिदान पर राजनीति की रोटियां सेकने का अवसर खोजते हैं यह बहुत ही शर्मनाक है। फिर भी हम शहीदों के संदर्भ में शोर मचाना, वितण्डा खड़ा करना, अखबारों में ऐसे बयान देना कि मेरा स्वदेशी नेता तो आहत हो ही, मैं शत्रु देश में भी स्वदेश के खिलाफ प्रमाण बन जाऊं, यह सब चलता रहता है।

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