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उपेक्षा का शिकार हिन्दी

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श्याम सिंह पंवार

कहा जाता है कि ज्ञान जितना अर्जित किया जाये उतना ही कम होता है फिर चाहे वह किसी क्षेत्र का हो, सांस्कृतिक हो या भाषायी। लेकिन भाषायी क्षेत्र की बात करें तो हिन्दी भाषा को सम्मान व उचित स्थान दिलाने के लिए हर वर्ष पूरे देश में 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। बावजूद इसके हिन्दी को उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। ज्यादातर सरकारी विभागों में सिर्फ हिन्दी दिवस का बैनर लगाकर हिन्दी पखवाड़ा मनाकर इति श्री कर ली जाती है। यह एक श्रृद्धान्जलि ही हिन्दी के प्रति कही जा सकती है। वहीं न्यायालयी क्षेत्र की बात करें तो वहां भी सिर्फ लकीर ही पीटी जाती है। लिखा पढ़ी में अंग्रेजी प्रयोग करने वाले व्यक्तियों को ज्यादा बुद्धिमान माना जाता है अपेक्षाकृत हिन्दी लिखने व बोलने वालों के। यह नारा भी सिर्फ मुंह चिढ़ाने के अलावा कुछ नहीं दिखता कि ‘हिन्दी में कार्य करें, हिन्दी एक….।।’ लेकिन क्या आप जानते हैं कि 14 सितम्बर के दिन ही हिन्दी दिवस क्यों मनाया जाता है? कहा जाता है कि जब वर्ष 1947 में भारत से ब्रिटिश हुकूमत का पतन हुआ तो देश के सामने भाषा का सवाल एक बड़ा सवाल था क्योंकि भारत देश में सैकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियां थीं और उस दौरान भारत का संविधान तैयार करने के लिए संविधान सभा का गठन हुआ। संविधान सभा के अंतरिम अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा बनाए गए। बाद में डाॅक्टर राजेंद्र प्रसाद को इसका अध्यक्ष चुना गया। वहीं डाॅ0 भीमराव आंबेडकर संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली कमेटी) के चेयरमैन थे। संविधान सभा ने अपना 26 नवंबर 1949 को संविधान के अंतिम प्रारूप को मंजूरी दे दी। इसके बाद भारत का अपना संविधान 26 जनवरी 1950 से पूरे देश में लागू हुआ।
संविधान में विभिन्न नियम कानून के अलावा नए राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का मुद्दा अहम था। उस दौरान काफी विचार-विमर्श के बाद हिन्दी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की आधिकारिक भाषा चुना गया और 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने इस ऐतिहासिक दिन के महत्व को देखते हुए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया और पहला आधिकारिक हिन्दी दिवस 14 सितंबर 1953 में मनाया गया। तब से लेकर आज तक प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर के दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के रूप में मनाकर हिन्दी को सम्मान दिलाने का दम भरा जा रहा है लेकिन यह कटु सत्य है कि तमाम प्रयासों के बावजूद हिन्दी को वह स्थान नहीं प्राप्त हो पा रहा है जिसकी वो हकदार है। आज हमारे तमाम जन प्रतिनिधि अपने पद की शपथ या विचार व्यक्त करने में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग कर अपने आपको गौरवान्वित समझते हैं। हालांकि पहले की अपेक्षा भाषणवाजी में कुछ झुकाव हिन्दी की ओर दिखा है लेकिन अभी यह आधा अधूरा है। वहीं यह कहना अनुचित न होगा कि आज के युग में अंग्रेजी को सीखने या बोलने में लोग इस लिए भी रूचि ले रहे हैं क्यों कि बेरोजगारी के दौर में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करने वालों को ज्यादा तरजीह मिलती है अपेक्षाकृत हिन्दी बोलने वालों के। सरकारी क्षेत्र में अगर बात करें तो आधुनिक दौर में चाहे वह बैंकिंग क्षेत्र या हो अन्य कोई भी…उनमें ज्यादातर कार्य अंग्रेजी में ही किया जाता है सिर्फ दिखावे के लिए ही हिन्दी पखवाड़ा मनाकर एक परम्परा का निर्वहन किया जा रहा है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि आज भी हिन्दी भाषा हर विभाग में चाहे वह प्राईवेट / निजी संस्थान हो या फिर सरकारी, हर विभाग में हिन्दी भाषा उपेक्षा का शिकार है और 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाकर हिन्दी को श्रृद्धान्जलि देने का कार्य किया जा रहा है।