डाँ नीलम महेंद्र, ग्वालियर (मप्र)
केन्द्र सरकार द्वारा पुराने 500 और 1000 के नोटों का चलन बन्द करने एवं नए 2000 के नोटों के चलन से पूरे देश में थोड़ी बहुत अव्यवस्था का माहौल है। आखिर इतना बड़ा देश जो कि विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में दूसरे स्थान पर हो थोड़ी बहुत अव्यवस्था तो होगी ही।
राष्ट्र के नाम अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री ने यह विश्वास जताया था कि इस पूरी प्रक्रिया में देशवासियों को तकलीफ तो होगी लेकिन इस देश के आम आदमी को भ्रष्टाचार और कुछ दिनों की असुविधा में से चुनाव करना हो तो वे निश्चित ही असुविधा को चुनेंगे और वे सही थे।
आज इस देश का आम नागरिक परेशानी के बावजूद प्रधानमंत्री जी के साथ है जो कि इस देश के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करता है।
यह बात सही है कि केवल कुछ नोटों को बन्द कर देने से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता इसलिए प्रधानमंत्री जी ने यह स्पष्ट किया है कि काला धन उन्मूलन के लिए अभी उनके तरकश से और तीर आना बाकी हैं।
भ्रष्टाचार इस देश में बहुत ही गहरी पैठ बना चुका था। आम आदमी भ्रष्टाचार के आगे बेबस था यहाँ तक कि भ्रष्टाचार हमारे देश के सिस्टम का हिस्सा बन चुका था जिस प्रकार हमारे देश में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही थी उसी प्रकार सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचारियों द्वारा एक समानांतर सरकार चलायी जा रही थी।
नेताओं सरकारी अधिकारियों बड़े बड़े कारपोरेट घरानों का तामझाम इसी काले धन पर चलता था। अमीरों और गरीबों के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही थी।
Jansaamna
भारत अपनी सीमाओं के चारो ओर अधिकांशतः बेचैन और अशांत पड़ोसियों से घिरा हुआ है। बांग्लादेश के संदर्भ में भी भारत कई प्रकार की शंकाओं से ग्रस्त रहा है। बांग्लादेश में प्रायः राजनैतिक अस्थिरता का वातावरण बना रहता है। बांग्लादेश की अस्थिर राजनीति का प्रभाव भारतीय सीमाओं पर भी दिखाई पड़ता है। वर्ष 2011 में शेख हसीना ने संविधान में संशोधन के द्वारा सर्वदलीय सरकार के अधीन चुनाव कराने का रास्ता प्रशस्त किया था। इसके बाद से ही बांग्लादेश में निरंतर दो बड़ी राजनैतिक प्रतिद्वंदियों-शेख हसीना व खालिदा जिया के मध्य गंभीर टकराव की स्थिति बनी हुई है। खालिदा जिया गैर दलीय सरकार के अधीन चुनाव कराने की मांग करती रही हैं। शेख हसीना के इस्तीफे की मांग भी उनके द्वारा निरंतर की जाती रही है। खालिदा जिया के बहिष्कार के बाद बांग्लादेश में हुए चुनावों को आम तौर पर निष्पक्ष चुनाव माना गया। खालिदा जिया की यह सोच थी कि जिस प्रकार 1996 में सत्ता संभालने के चार माह बाद उन्हें स्वयं दबाव में आकर चुनाव कराना पड़ा था, ऐसे ही शेख हसीना भी दबाव में आकर चुनाव कराने के लिए विवश हो जाएंगी। बांग्लादेश की राजनीति में कट्टरपंथी तत्व तेजी से हावी होते जा रहे हैं।
लाॅ, विधि या कानून सभ्यता के विकास के साथ-साथ रूढ़ियों, प्रथाओं और परम्पराओं को परिवर्तित कर स्वयं को विकसित करता रहा है इस क्रम में समय के साथ बहुत से बेकार नियम और कानून नष्ट होकर नए उपयोगी व व्यवहारिक कानून बनते चले आए हैं और आगे भी बनते रहेंगे। मानवीय क्रियाकलापों को अनुशाषित रखने के लिए यह युक्ति, रूपान्तरण की यह प्रक्रिया आवश्यक भी है। सदियों से चले आ रहे गलत और अन्यायपूर्ण रिवाजों को दैवी नियम या धर्म शास्त्र का आदेश कह कर अपने स्वार्थ के लिए चलाते जाना न केवल राष्ट्र के कानून व्यवस्था की त्रुटि है बल्कि उस समाज के बुद्धि जीवियों और राजनीतिक अग्रगण्यों की भी निष्फलता और ह्रदयहीनता है। सड़े गले रिवाज किसी कष्टकारी बीमारी की तरह है जिसका इलाज कराने के बजाय ढ़ोते रहना मूर्खता भी है। हाल का तीन तलाक मुद्दा ऐसी हीं एक बीमारी, एक बेकार और निष्ठुर प्रथा है जिसे जितनी जल्दी हो सके सामाजिक तथा नैतिक विधिशास्त्र के अन्तर्गत खत्म करके विधि को स्वयं को बेदाग और न्यायपूर्ण बनाना चाहिए। धर्मग्रन्थ का हवाला देकर इसे चलाते जाना मक्कारी है क्योंकि कोई भी धर्म मानव व समाज की भलाई के लिए होता है आखिर धर्म की चाबुक से स्त्रियों की खाल उधेड़ कर कोई समाज तरक्की कर सकता है क्या ? धर्मग्रन्थ की आयतों का अपने स्वार्थ और सहूलियत के हिसाब से अर्थ निकाल लेना कहाँ की बुद्धि मत्ता है ?
-एम. अफसर खां सागर
भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए यह बहुत आवश्यक है कि उसके नागरिक स्वस्थ रहें। भारत में अनियमित जीवनशैली और खराब खान-पान के कारण अधिसंख्य नागरिक प्रतिदिन बीमार ही बने रहते हैं। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में सर्वत्र अस्पताल बीमारों से पटे पड़े रहते हैं। देश में हर समय कोई न कोई संक्रामक रोग चलन में बना ही रहता है और करोड़ों नागरिक निरंतर संक्रामक बीमारियों और बुखार आदि से पीड़ित रहते हैं।
बुनियादी सच्चाईयों और तथ्यों की की अनदेखी करते हुए पाकपरस्त अलगाववादी राज्य में सक्रिय आतंकी ताकतों के साथ मिलकर ‘धरती का स्वर्ग’ समझे जाने वाले कश्मीर को ‘जहन्नुम’ बना देने पर आमादा हैं। इन अलगाववादियों द्वारा फैलाई जा रही हिंसा,आगजनी, व तोड़-फोड़ के बाद जब कभी सुरक्षाबल जवाबी कार्रवाई करता है और उसमें किसी प्रदर्शनकारी की मौत हो जाती है, तो यही अलगाववादी सुरक्षा बलों के विरुद्ध आक्रोशित होकर नारेबाजी करने लगते हैं। कुल मिलाकर पाकिस्तान और उसकी शह पर निजी हित साध रहे कश्मीरी अलगाववादी नेता कश्मीर को कुछ नहीं दे सकते। इनकी धोखे की राजनीति ने कश्मीर और कश्मीरी जनता का बहुत अहित किया है। कश्मीरी जनता अब समझदार और परिपक्व ढंग से इन परिस्थितियों का अवलोकन कर रही हैं। विश्वास किया जाना चाहिए कि कश्मीर में पाकिस्तान और उसकी शह पर मजे कूट रहे कश्मीरी अलगाववादी नेता शीघ्र ही हाशिए पर दिखाई पड़ेंगे।

जी बिल्कुल सही कहते हैं आप, सरकार बेकार, समाज बेकार, लोकतन्त्र में समस्या, शासन प्रणाली सही नहीं, बस सारी जिंदगी दोष देते रहते हैं हम। कभी सोचा ये बने किससे, कौन है इनका आधार, कौन है जिम्मेदार। नहीं कभी नहीं, चलिए ये बताइए कि आपने क्या किया, सिवाय गाल बजाने के, कभी किसी सामाजिक कार्य में भागीदारी की, कभी निस्वार्थ भावना से किसी गैर की समस्या का समाधान किया, शायद कभी नहीं, करें भी क्यूँ। क्या लेना देना आपको, सीधे सच्चे इंसान हैं आप, अपने रास्ते जाना, अपने रास्ते आना अपना घर, अपनी गृहस्थी, मगन हैं आप अपनी दाल रोटी में। वो बात अलग है कभी कहीं सामाजिक मुद्दों पर बात हुई तो समय पास करने का अच्छा साधन, आपकी बेबाक राय, सिर्फ कोरी राय, करना धरना कुछ नहीं । वो ही कहावत चरितार्थ ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’’।