देश में लाॅकडाउन है और मैं भी तमाम देशवासियों की तरह घर में रहने को मजबूर हूं। हालांकि लाॅकडाडन घोषित होते समय अन्दर से बहुत खुश था कि विद्यालय बंद हो जाने से इस अवधि में लेखन के शौक के चलते कुछ लिखने-पढ़ने का सार्थक काम हो जायेगा। और तदनुरूप योजना भी बना ली थी कि कम से कम तीन कहानी, चार-पांच लेख, एक दर्जन कवितएं और मन भर हाईकू तो रच ही डालूंगा। पेन, पैड, लैपटाप सब तैयार कर लिया था। अखबार कोरोना समाचार और चित्रों से भरे हैं। रेहड़ी, ठेला और पटरी पर दो जून की रोटी तलाशने वाले छोटे-मोटे व्यापारी-कामगार रोजगार बंद होने से पेट की आग में झुलस रहे हैं। कल-कारखानों से भगाये गये मजदूर डे-नाईट वाॅकिंग करते हुए किसी तरह अपने गांव-घर पहुंचे तो प्रशासन ने उन्हें घरबदर कर स्कूलों में बने आइसोलेशन वार्ड में पटक दिया है। जहां दीवारों में अंकित सद्वाक्य ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेसु कदाचन’ का अर्थ समझते उनका समय बीत रहा है। सोचा कि एक लेखक होने के नाते उनके दर्द को स्वर देना भी मेरा दायित्व है तो उन पर भी कुछ कालजयी लेखन कर डालूं। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। घर पर दो दिन तो आराम से कटे। समय से चाय नाश्ता, लंच-डिनर, रात को सोते समय केशर-शहद मिला दूध और साथ में एक चम्मच स्वर्णभस्म युक्त च्यवनप्रास भी। तो इतना सब खाने-पीने के बाद रचनाएं भी मक्खन की मानिन्द दिमाग में उतराने लगी थीं। पर हाय रे मुआ कोरोना, चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात, बकरे की मां कब तक खैर मनायेगी, काम का न काज का दुश्मन अनाज का जैसे मुहावरे अब वास्तविक अर्थ के साथ साक्षात थे। तीसरे दिन की सुबह से आज की सुबह है, मैं बस मुआ कोरोना को कोस रहा हूं। कोरोना मिल जाये तो बिना नमक, मिर्च-मसाले के कच्चा ही चबा जाऊं। आप पूछ रहे हैं हुआ क्या, अरे जनाब यह पूछिए कि क्या नहीं हुआ।
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