Wednesday, August 5, 2026
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वेश्या और कुलपति

अर्थशास्त्री बोल रहे थे
वह समय बेच रही है।

समाज बोल रहा था
वह देह बेच रही है।

और रिश्तेदार बोल रहे थे
वह इज़्ज़त बेच रही है।

लेकिन वह जो नहीं बेच रही थी
वह था ईमान।

इस बात का हुआ ज्ञान
जब एक प्रोफेसर आए।

उनके पास थी बड़ी ज्ञान की दुकान,
जिन्होंने हाल ही में बेच दिया था ईमान।

ईमान बेचकर
देह खरीदने वाले
समाजशास्त्र के प्रोफेसर
अब कुलपति बन चुके थे।

वे सरकार की चाटते थे,
और अपनी विचारधारा में
असिस्टेंट प्रोफेसरशिप बाँटते थे।

वे हर बार सरकार को नमन करते,
छात्रों की लोकतांत्रिक माँगों का दमन करते।

मन की बात सुनते थे,
प्रचार सामग्री बुनते थे।

✍️ अंशु शरण, पाइने, जर्मनी