नयी दिल्ली: कविता पंत। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज कहा कि हमें प्रशासनिक सेवाओं में ऐसे युवाओं को लाना चाहिए जो लोक सेवा से प्रेरित हों, न कि पद से, इसलिए भर्ती परीक्षा में केवल उम्मीदवार के ज्ञान का परीक्षण करने के बजाय, यह भी देखना चाहिए कि वह युवा प्रशासनिक सेवाओं में शामिल होने की आकांक्षा क्यों रखता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के शताब्दी समारोह में भाग लिया। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में शताब्दी की समृद्ध विरासत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह 100 साल का उत्सव वास्तव में लाखों युवाओं की अपार आकांक्षाओं और संस्था पर प्रत्येक भारतीय के अटूट विश्वास का उत्सव है।
उन्होंने बदलती पीढ़ियों, सरकारों, प्रौद्योगिकियों और पाठ्यक्रम के बावजूद संस्था की अटूट विश्वसनीयता की सराहना की और इस अवसर पर एक स्मारक डाक टिकट, एक विशेष सिक्का और 100 महत्वपूर्ण केस कानूनों का संकलन जारी किया।
प्रधानमंत्री ने विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में चयन आयोगों की महत्वपूर्ण भूमिका का विस्तार से वर्णन करते हुए इस बात पर बल दिया कि आज भर्ती किए गए युवा एक साथ राष्ट्र के भविष्य के मुख्य निर्माता और प्राथमिक लाभार्थी होंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रत्येक चयन प्रक्रिया को राष्ट्र और नागरिक को प्राथमिकता देने के दोहरे मापदंड पर कड़ाई से परखा जाना चाहिए।
श्री मोदी ने कहा, ‘‘जब इस भावना से परिपूर्ण उम्मीदवारों का चयन होगा, तो राष्ट्रीय लक्ष्यों को अर्जित करना कहीं अधिक स्वाभाविक और सरल हो जाएगा।’’
प्रधानमंत्री ने भर्ती प्रक्रिया में मूलभूत बदलाव का आग्रह करते हुए इस बात पर बल दिया कि चयन के मापदंडों में केवल अकादमिक ज्ञान का ही नहीं, बल्कि उम्मीदवारों की अंतर्निहित प्रेरणा का भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए, ताकि वे केवल सरकारी पद की लालसा के बजाय जनसेवा की ओर आकर्षित हों।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सही अंतर्निहित प्रेरणा वाले व्यक्तियों का चयन करने से प्रशासन के लिए तेजी से बदलती जन आकांक्षाओं के अनुरूप ढलना अत्यंत सरल हो जाता है। श्री मोदी ने कहा, ‘‘इसलिए, हमें भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार अपने चयन मापदंडों और भर्ती प्रक्रिया को भी बदलना होगा।’’
नवनियुक्त प्रशासनिक अधिकारियों के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करते हुए प्रधानमंत्री ने सुझाव दिया कि प्रशिक्षु अधिकारियों को अपनी मूल प्रेरणाओं को लिख लेना चाहिए ताकि भविष्य में आने वाली चुनौतियों और जिम्मेदारियों के समय वे आत्म-मूल्यांकन के लिए इनका उपयोग कर सकें।
उन्होंने यूपीएससी और राज्य आयोगों को उम्मीदवारों के लिए इसी तरह की आत्म-निरीक्षण प्रणाली को संस्थागत रूप देने के लिए प्रोत्साहित किया।श्री मोदी ने कहा, ‘‘यूपीएससी और राज्य आयोग भी ऐसी प्रणाली विकसित करने पर विचार कर सकते हैं।’’
प्रधानमंत्री ने अतीत की पुरातन ‘माई-बाप’ शासन प्रणाली को त्यागते हुए, ‘नागरिक देवो भवः’ के परम सिद्धांत पर आधारित एक आधुनिक प्रशासनिक युग की शुरुआत का उल्लेख किया जिसमें नागरिक को ईश्वर के समान माना जाता है। उन्होंने घोषणा की कि नागरिक सेवा को सर्वाेपरि रखना 21वीं सदी के शासन का मूल आधार है। इसका अर्थ यह है कि देश का नागरिक हमारे लिए किसी देवता से कम नहीं है।
प्रधानमंत्री ने इच्छा जताई कि राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर चयन प्रक्रियाओं को सावधानीपूर्वक तैयार किया जाए ताकि ऐसे पेशेवरों की भर्ती हो सके जो समस्याओं का पूर्वानुमान लगा सकें और अनावश्यक दबाव या प्रभाव के बिना काम कर सकें।
उन्होंने सहानुभूति का भाव रखने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की आवश्यकता पर बल दिया जो नवीन समाधान खोजें, नागरिकों के जीवन को सुगम बनाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करें और जनता पर कानूनों के प्रभाव का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें। श्री मोदी ने कहा, ‘‘हमें देश को ऐसे पेशेवर देने होंगे जो कठिन समस्याओं का समाधान खोजने के लिए अभिनव तरीके अपना सकें।’’
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