Friday, October 16, 2026
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चाइनीज़ मांझा: प्रतियोगिता बनाम नैतिकता का क्रूर केस स्टडी

चाइनीज़ मांझा भारत में एक नायाब उदाहरण है, जो प्रतियोगिता और नैतिक पतन का, या सीधे-सीधे कहें तो गला-काट प्रतियोगिता का, उदाहरण है। इस मांझे से भारतीयता से लेकर मानवता तक कई पैमाने आप माप सकते हो। चाइनीज़ मांझे से देश भर में लोग घायल हो रहे हैं और जान गंवा रहे हैं। जान गंवाने वालों की संख्या किसी भी नॉर्डिक कंट्री में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या से ज़्यादा है। ऐसे में हम लोगों के बीच एक सवाल है। क्या लोग अपनी 10-20 रुपए की पतंग को बचाने की कोशिश में, या पतंगबाज़ अपनी दक्षता की साख को बचाने की कोशिश में ऐसा कर रहे हैं? हाल ही में मेरे शहर बनारस में एक व्यवसायी की मौत चाइनीज़ मांझे से गला कटने से हुई।

बनारस भारत का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करता है। कई लोगों का मानना है कि यहाँ पर एक सुकून महसूस होता है। कई लोगों का मानना है कि यहाँ पर गंगा-जमुनी तहज़ीब की मौजूदगी है। बनारस के सुकून भरे माहौल में, गंगा-जमुनी तहज़ीब के लोगों के बीच, धर्म से दीक्षित लोगों के बीच, सांस्कृतिक दार्शनिकों के घेरे में रहने के बावजूद पतंगबाज़ आखिर क्यों महसूस नहीं कर पा रहे हैं वो सुकून? दीवारों से घिरे हुए मोहल्लों के बीच में भी लोग मांझे के साथ पतंगबाज़ी करते हैं। वो ‘काटा’ का उद्घोष होता है। लोग अपनी पतंग को कटने से बचाना चाहते हैं, भले राहगीरों का गला कट जाए। दरअसल, पतंगबाज़ अपनी साख, अपने अहंकार को चाइनीज़ मांझे से बचा रहे हैं। कुल मिलाकर मैं यह बताना चाहता हूँ कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति, हमारा शहर, हमारा सुकून हमें वो नैतिक बल नहीं दे पा रहा है कि हम चाइनीज़ मांझे का विरोध कर उसे समाज से बाहर करें।

और यही नहीं, कुछ साल पहले राष्ट्रवादी समूहों ने एंटी-चाइना मुहिम के तहत चाइनीज़ उत्पादों का विरोध किया। इन विरोधों के बीच भी कुछ नहीं हो पाया। और चाइनीज़ मांझा बिक रहा है। तो अगर आप देखें, तो राष्ट्रवाद हो, चाहे संस्कृति हो, चाहे धर्म हो, चाहे हमारी कोई भी वैचारिक विरासत हो, यह हमारे प्रतिस्पर्धी, गला-काट प्रतिस्पर्धी स्वभाव को रोक नहीं पा रहा है। और अगर हम लोग बनारस से बाहर पूरे भारत की बात करें, तो भारतीयों का यह व्यवहार केवल पतंग तक ही सीमित नहीं है। पतंग को अगर आप उनके जीवन की उपलब्धि, उनके अर्जन के तौर पर देखें और मांझे को एक माध्यम के रूप में देखें, तो आप देखेंगे कि भारतीयों को केवल ऊँचाइयाँ ही दिख रही हैं। उन्हें ज़मीन पर मौजूद उनके अन्य साथी, उनके अन्य भारतीय मित्र नहीं दिख रहे हैं।

विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति वाला हमारा समाज न तो नैतिक बल दे पा रहा है और न ही पतंगबाज़ अपराधियों को समाज से अलग कर पा रहा है। पतंगबाज़ी को लेकर मैं समाज की आलोचना आज इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि यह ऐसा अपराध है, जिसका प्रेरक तत्व न आर्थिक लाभ है, न पैसा और न ही बदला लेना। इसमें ज़्यादातर लोग अपने आनंद के चलते, यानी पतंगबाज़ी के चलते, गैर-इरादतन तौर पर किसी को मार देते हैं या किसी को घायल कर देते हैं। इसलिए मेरा मानना है कि चाइनीज़ मांझा भारत में प्रतिस्पर्धी स्वभाव और नैतिक पतन का एक क्रूर केस स्टडी है।

– डॉ. अंशु शरण, पाइने, जर्मनी