Tuesday, November 3, 2026
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लेख/विचार

सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि एक सेवा कर रहे हैं

सरकारी योजनाओं के ईमानदार क्रियान्वयन पर, कर्तव्य पथ एक इतिहास रचता है
वैश्विक स्तरपर भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और जनसंख्या में द्वितीय क्रमांक पर है। भारत में लोकतंत्र के चार स्तंभ माने जाते हैं न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और चौथा मीडिया। हर स्तंभ अपने अपने कार्यक्षेत्र में सुचारू रूप से कार्य कर अपने अपने स्तरपर नए सकारात्मक आयाम प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
साथियों इन चार स्तंभों में से मेरा मानना है कि कार्यपालिका के ऊपर विधाययिका द्वारा लिए गए फैसलों, कानूनों, न्यायपालिका के दिशानिर्देशों, आदेशों और मीडिया द्वारा झूठ से हटाए गए पर्दों और सच्चाई के मुद्दों पर अमल करने की ज़वाबदारी और कर्तव्य कार्यपालिका पर है। याने हम सीधे शब्दों में कहें तो, माने गए चार स्तंभों में से तीनों स्तंभों के निर्णय, सुझाव, दिशानिर्देशों इत्यादि को क्रियान्वयन करना कार्यपालिका की ही जवाबदारी और कर्तव्य है।
उसके बाद कार्यपालिका स्वयं द्वारा सुशासन, लोकहित, दूरगामी इंस्ट्रक्चर इत्यादि अनेक जनहित कार्यक्रमों, सरकारी योजनाओं को क्रियान्वयन की ज़वाबदारी कर्तव्य भी कार्यपालिका को करना होता है जिसका निर्णय शासन द्वारा रणनीतिक रोडमैप बनवाकर लिया जाता है तथा उसे प्रशासन द्वारा क्रियान्वित करने की जवाबदारी संभाली जाती है ऐसी प्रक्रिया की जानकारी जहां तक मुझे है।
साथियों बात अगर हम इन सरकारी योजनाओं, निर्णयों, दिशानिर्देशों इत्यादि को क्रियान्वयन करने की करें तो हमने आम बोलचाल में सुने होंगे कि सरकारी नौकर, सरकारी नौकरी, जनता के सेवक इत्यादि अनेक शब्दों का प्रयोग छोटे से चपरासी, पटवारी से लेकर मंत्रालयों के मुख्य सचिववों तक के पदों के लिए प्रयुक्त होते हैं परंतु मेरा मानना है कि इसके लिए सरकारी सेवक एक बहूसूचक, बहुमूल्य शब्द है इससे बोध होता है की सेवा करना है और इस सेवा में बहुमूल्य आध्यात्मिक बोध समाया होता है!! जिसका अंतिम स्तरपर अदृश्य सेवाफल ईश्वर अल्लाह से प्राप्त होने की कामना शामिल है, ऐसी मेरी भावना है!

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मेरी हर कमी को है तू लाज़मी

रूह की शिद्दत से जुड़े दो व्यक्ति के बीच एक ऐसे सेतु का निर्माण हुआ होता है कि अगर एक सिरा टूट जाता है तो दूसरा मुरझा जाता है। एक व्यक्ति के चले जाने से दुनिया खाली हो जाती है, वक्त थम जाता है और खुशियाँ रूठ जाती है। भले इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता फिर भी तुम क्यूँ चले गए? ये सवाल ज़हन में बार-बार उठता है। एक टीश, एक कसक और तड़प रह जाती है। एकाकीपन वो सज़ा है जो भुगत रहा होता है वही जानता है।
दुनिया की कोई शै लुभाती नहीं एक इंसान की कमी कोई खजाना भरपाई नहीं कर सकता।
नहीं मुझे मोह किसी अनमोल खजाने का
दिल मेरा तलबगार है तेरी चाहत के तराने का
हर इंसान के जीवन में कोई एक व्यक्ति ऐसी होती है जो हमारी खुशी का कारण और जीने की वजह होती है। जिनकी उपस्थिति हमारे जीवन में इन्द्रधनुषी रंग भरकर होठों को हंसीं देती है। जिसका हमारे आसपास होना हमें संबल देता है। उसका हाथ थामें हर सफ़र आसान लगता है। हर मुश्किल सरल लगती है। उनके कहे तीन शब्द ‘मैं हूँ ना’ हर चिंता से निजात दिलाता है। हौसलों में जान ड़ालता है। उसकी आभा और ओज ज़िंदगी की तम भरी राहों में रोशनाई भरते हमें मंज़िल तक पहुँचाती है।

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लघुकथाः मुँह बोला रिश्ता

रामनिवास बहुत ही भावुक और दूसरों पर अत्यधिक अपनत्व लुटाने वाला और विश्वास करने वाला व्यक्ति था। नियति की विडम्बना ने उसकी बहन को बचपन में ही छीन लिया। रामनिवास की पत्नी हरिश्री अत्यधिक समझदार थी। वह अकसर रामनिवास को रिश्तों की गंभीरता को समझने पर बल देती थी, पर रामनिवास सारी दुनिया को निःस्वार्थ प्रेम लुटाने वाला ही समझता था। राखी वाला दिन था, रामनिवास बहन की यादों में डूबा था। अचानक उसके परममित्र के परिवार का आगमन हुआ और संयोगवश राखी-डोरे का संबंध स्थापित हुआ, पर हरिश्री जीवन की गहराइयों से भली-भाँति परिचित थी। वह जानती थी मुँह बोले रिश्तों की सच्चाई।
इस नए रिश्ते में पूरा समर्पण रामनिवास का ही था। वह मामा बनने पर बच्चों पर अपनत्व और प्रेम लुटाया करता था। जब भी बहन की माँ रोगग्रस्त हुई तबभी रामनिवास ने पूरे समय दायित्व का निर्वहन किया। पारिवारिक शादियों में भी रामनिवास ने अपना भरपूर सहयोग प्रदान किया। रामनिवास निश्छल व्यक्तित्व का धनी था अतः उसने इस मुँह बोले रिश्ते को निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। जरूरत के अनुसार बच्चों की देखरेख, बाहर से सामान लाना और जरूरत के हर समय वह खड़ा रहता था। रामनिवास पूर्ण तन्मयता से सब कुछ करता था। अबकी बार बारी थी रामनिवास के मुँह बोले रिश्ते की परीक्षा की, इस बार रामनिवास के बच्चों के जीवन पर संकट के काले बादल छा गए। अब रामनिवास को भी इसी सहयोग की जरूरत थी, पर उसके मुँह बोले रिश्ते ने दिखावे का मुखौटा धारण किया हुआ था, जिसमें ऊपरी दिखावा और अंदर भरपूर मनोरंजन समाहित था। उन्हें तो रामनिवास के दुःख से कोई सरोकार नहीं था। हरिश्री ने रामनिवास का इस ओर ध्यान आकृष्ट भी किया, पर रामनिवास तो आँख मूंदकर बैठा था।

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कुपोषित होते जा रहे शिक्षण संस्थान

जी हाँ ,मैं किसी सरकारी शिक्षण संस्थान की नहीं बल्कि छोटे-मोटे निजी विद्यालयों की बात कर रही हूँ l गत लगातार दो वर्षों से कोरोना अपना रंग दिखा रहा है, नए-नए तरीकों से परेशान कर रहा है l जब शुरुआत कोरोना नमक वैश्विक महामारी की लहर तो उसके साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में में भी जबरदस्त बदलाव देखने को मिला l जहां बच्चों को मोबाइल से दूर रहने की हिदायत दी जाती थी और शिक्षकों को कक्षा में मोबाइल फोन का इस्तेमाल वर्जित था ,वही ऑनलाइन क्लास नामक तत्व संजीवनी बूटी बनकर सामने आया। ऑनलाइन कक्षा चलना विकल्प तो बहुत अच्छा था । हम ऐसे कक्षाओं के परिचालन की कभी परिकल्पना किया करते थे । और चाह कर भी हम इस तरह के प्रयोग में वर्षों लगा देते शायद ,लेकिन समय और परिस्थितियों ने सब कुछ तुरंत ही कर दिया । शिक्षा जगत में ऑनलाइन क्लास के माध्यम से एक बदलाव भी आया बच्चों और शिक्षकों के पास स्मार्ट फ़ोन होना अनिवार्य हो गया ।

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मगरमच्छ के आंसू

वो दौर था जब अफगानिस्तान में तालिबानों का अफगान फौज को हरा कर कब्जा कर लिया था और वह केहर बरपा रहे थे तब पाकिस्तान की सारी हमदर्दी तालिबानियों के साथ थी और दबी जुबान में के रहे थे कि तालिबानियों की मदद से कश्मीर में अलगाव को बढ़ावा देने की और दूसरे मामलों में भी उनकी मदद लेके भारत में कुछ हालत ऐसे कर देंगे जिससे देश में मुश्किलें बढ़ जाए। इतनी सहानुभूति दिखाते थे कि वही लोग ही उनके अकेले दोस्त है,अमेरिका ने जो उनके फंड्स रोक लिए थे उन्हे भी रिलीज करने की बिनती कर चुके थे लेकिन क्या वह सच में अफगानिस्तान के दोस्त हैं? कितनी मानवीय मदद की हैं पाकिस्तान ने ये कोई पूछे तो?

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चुनाव की घोषणा होते ही राजनीतिक दलों में मचा भारी उठापटकः वीरेंद्र कुमार जाटव

10 जनवरी की बिछी बिसात क्या बीजेपी पर पड़ेगी भारी

नई दिल्ली। योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने इस्तीफा देकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारी हलचल पैदा कर दी है, इस्तीफा देने के बाद पत्रकारों से वार्ता करते हुए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्रकारों के साथ वार्ता करते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि सरकार में और संगठन में दलितों पिछड़ों की उपेक्षा अन्याय और अपमान बर्दाश्त के बाहर था। इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया है। स्वामी प्रसाद मौर्य का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी के बैठकों में नीतिगत फैसला लेते समय दलित और पिछड़ों की भावनाओं को ध्यान नहीं रखा जाता था और न ही उनके प्रतिनिधियों को शामिल किया जाता था।

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महामारी ने जीवन जीने का ढंग बदला, शिक्षा के परम्परागत सीखने तरीकों में समयानुसार बदलाब करने की आवश्यकता

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि वर्तमान में कोविड 19 या कोरोना के संकट के इंसानी जीवन के हर पक्ष को प्रभावित किया है। मानवीय जीवन के कुछ हिस्से ज्यादा और कुछ कम प्रभावित हो सकते हैं लेकिन हर किसी पक्ष पर इसका कुछ न कुछ असर तो हो ही रहा है। शिक्षा जगत भी एक ऐसा क्षेत्र है जहां इसका व्यापक असर देखा जा सकता है। ग़ौरतलब है कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान लगभग सभी स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों को बंद कर दिया गया और आदेश दिया गया कि ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से बाकी बचे कोर्स को पूरा कराया जाये। जिसकों लेकर सरकारों ने सभी के लिए ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था करने की कमान संभाली l महामारी से पहले परम्परागत स्कूली शिक्षा पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित था, अब महामारी के कारण स्कूली शिक्षा बाधित हुई है, 2022 में शिक्षा का रुख ऑनलाइन शिक्षा एवं ई-लेर्निंग्स की ओर रुझान बढ़ रहा हैl बहुत से पढ़ाई जो क्लास रूम में बैठकर पूरी की जाती थी अब घर बैठे बहुत से कोर्स पूरे किये जा रहे है l दुरस्त शिक्षा के माध्यम से अब ऐसे बच्चों तक भी पहुँच बनाई जा रही है जी कभी शिक्षा की मुख्य धारा से पीछे हो गए थे l पूर्व- प्राथमिक व प्राथमिक शिक्षा के लिए कुछ अलग से सोचने की आवश्यकता है जिससे शुरुआती शिक्षा को बच्चों में प्रेषित की जाएl बच्चों की शुरूआती दक्षताओं को पूर्ण करने के लिए समय के साथ लक्ष्य तय करने एवं मासिक प्राथमिक कौशल की उपलब्धि पाने पर ध्यान केन्द्रित करना होगाl प्रत्येक कक्षा में बच्चों को कक्षा अनुसार दक्षता की प्राथमिकता अनुसार जाँच कर उनकी सीखने में आई रूकावट एवं कमियों को दूर किया जाना चाहिएl सर्वप्रथम उनके लर्निंग लोस को पूरा किया जाकर नया पाठ्यक्रम आगे बढ़ाया जाये l शुरूआती कक्षाओं के लिए इसे कड़ाई से पूरा किया जाना आवश्यक हैl बच्चों की पढ़ाई के लिए माता-पिता, शिक्षकों एवं समुदाय की सहभागिता अति आवश्यक है, बच्चों के शिक्षण की गंभीरता को देखते हुए उनके कौशल बढ़ाने हेतु जिम्मेदारीपूर्ण कार्य करेlआज के समय में परम्परागत पढ़ाई का दौर बहुत बाधित हुआ हैl बच्चों की सीखने तरीकों में समयानुसार बदलाब करने की आवश्यकता हैl बच्चों को आधुनिकता से जुडी पठन-पाठन सामग्री से जोड़कर प्रायोगिक ज्ञान देने की आवश्यकता है, परंपरागत स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम पूरा कर पढ़ाई में बच्चों की दक्षता की ओर संकेत करती है परन्तु पाठ्यक्रम पूरा कर देने मात्र से बच्चों को पूर्ण दक्षता मिल जाएगी ये शायद हमारी भूल होगी, परम्परागत स्कूली पढ़ाई से थोड़ा हटकर बच्चों की पढ़ाई समझ के साथ पढ़ाई की प्राथमिकतायें तय किया जाये, एवं इसका जिम्मेदारी से पूरा करने का दायित्व सरकारें, शिक्षक एवं अभिभावक निभाए lलॉकडाउन के समय में बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा ऑनलाइन पढ़ाई के माध्यम से पूर्ण करने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर थी जिन्हें यथासंभव पूर्ण करने की कोशिश कीl ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से बच्चों और शिक्षको की परस्पर पढ़ाई का गेप को कम करने के लिए कार्य किया गया l परन्तु हम ये दाबे से नहीं कह सकते की यह साधन बच्चों के लिए पूर्ण कारगर रहा होगाl शिक्षा की वार्षिक रिपोर्ट असर 2021 के अनुसार नामांकित सभी बच्चों में से दो तिहाई से अधिक बच्चों के पास घर पर स्मार्टफ़ोन 67l6% हैं, इनमें से लगभग एक चौथाई 26.1% ऐसे बच्चे हैं जिनके लिए यह स्मार्टफ़ोन उपयोग के लिए उपलब्ध नहीं है। इसमें कक्षावार देखने पर यह स्पष्ट होता है कि छोटी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों की अपेक्षा उच्च कक्षा में पढ़ने वाले ज़्यादा|

श्याम कोलारा (लेखक)

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सोशल मीडिया का सही उपयोग हो

हम में से कितने लोग सोशल मीडिया से कुछ अच्छी बातें सीखते है? या सोशल मीडिया का उपयोग नीतिमत्ता से करते है, शायद बहुत कम। ज़्यादातर ये मंच झूठी तारीफ़, झगड़े, दुष्प्रचार और किसी को नीचा दिखाने के लिए ही उपयोग होता है।
सोशल मीडिया का गलत तरीके से उपयोग करते कुछ लोग अफ़वाहें और झूठी खबरें फैलाकर धर्म के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश करते है। भ्रामक और नकारात्मक जानकारी साझा करते है जिससे जनमानस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। और कई बार तो बात इतनी बढ़ जाती है कि सरकार सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल करने वालों पर सख्त हो जाती है।

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चुनाव 2022 बनाम ओमीक्रान वेरिएंट

ओमीक्रान वेरिएंट और चुनाव 2022 – क्या चुनावी जनसभाओं को डिजिटल मीडिया तक सीमित किया जाए ?
सभी राजनीतिक पार्टियों द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव आयोग से मिलकर चुनाव प्रचार के विकल्पों पर चर्चा करना ज़रूरी – एड किशन भावनानी
वैश्विक रूप से ब्रिटेन, अमेरिका सहित अनेक देशों में ओमीक्रान वेरिएंट का कहर और भारत में बढ़ते केसों को ध्यान में रखते हुए आगामी पांच राज्यों में कुछ महीनों में होने वाले विधान सभाओं का चुनाव और वर्तमान यूपी में हो रही रथ यात्राओं, रैलियों जनसभाओं में बिना उपयुक्त कोविड व्यवहार पालन के उपस्थित नागरिकों को देखते हुए बुद्धिजीवियों, प्रबुद्ध नागरिकों, जानकारों, टीवी चैनलों पर डिबेट और गली मोहल्लों में इस चर्चा को बल मिल रहा है कि क्या चुनावी सभाओं को डिजिटल मीडिया तक सीमित करने संबंधी किसी विकल्प पर विचार किया जाना उचित रहेगा ?

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कौवों की जमात

एक वीडियो देखा था, एक ताकतवर मुर्गा एक कौए पर चढ़ बैठा था और उसको अपनी चोंच से जोर जोर से वार कर उसे घायल कर दिया था और कौवों का झुंड उसके ऊपर और आसपास उड़ कर कांव कांव कर रहे थे। कोई भी कौवा उसे बचाने के लिए कुछ ठोस कदम नहीं उठा रहे थे। सिर्फ उड़ा उड़ करके शोर मचाते हुए उस कौए को मरते हुए देख रहे थे। अगर सभी कौवे एक साथ उस अकेले हमलावर पर घात करते तो शायद उस कौवे को बचा पाते। अगर नहीं भी बचा पाते तो अपनी ताकत का संदेश तो उस हमलावर मुर्गे को दे ही सकते थे। कांव कांव करके उड़ने से सिर्फ शोर हो सकता हैं बचाव नहीं।

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