Sunday, September 20, 2026
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लेख/विचार

सवा लाख से एक लड़ावाँ ताँ गोविंद सिंह नाम धरावाँ

चिड़ियाँ नाल मैं बाज लड़ावाँ
गिदरां नुं मैं शेर बनावाँ
सवा लाख से एक लड़ावाँ
ताँ गोविंद सिंह नाम धरावाँ
सिखों के दसवें गुरु श्री गोविंद सिंह द्वारा 17 वीं शताब्दी में कहे गए ये शब्द आज भी सुनने या पढ़ने वाले की आत्मा को चीरते हुए उसके शरीर में एक अद्भुत शक्ति का संचार करते हैं।
ये केवल शब्द नहीं हैं, शक्ति का पुंज है, एक आग है अन्याय के विरुद्ध, अत्याचार के विरुद्ध, भय के विरुद्ध, शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध, निहत्थे और बेबसों पर होने वाले जुल्म के विरुद्ध।
कल्पना कीजिए उस आत्मविश्वास की जो एक चिडिया को बाज से लड़ा सकता है, उस विश्वास की जो गीदड़ को शेर बना सकता है, उस भरोसे की जिसमें एक अकेला सवा लाख से जीत सकता है। और हम सभी जानते हैं कि उन्होंने जो कहा वो करके भी दिखाया।
मुगलों के जुल्म और अत्याचारों से टूट चुके भारत में एक नई शक्ति का संचार करने के लिए उन्होंने 1699 में बैसाखी के दिन आनन्दपुर साहिब में एक सभा का आयोजन किया। हजारों की इस सभा में हाथ में नंगी तलवार लिए भीड़ को ललकारा, इस सभा में कौन है जो मुझे अपना शीश देगा?
गुरु जी के ये शब्द सुनकर पूरी सभा में से जो पांच लोग अपने भीतर हौसला लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए आगे आए इन्हें गुरु गोविंद सिंह जी ने पंज प्यारे का नाम देकर खालसा पंथ की स्थापना की और नारा दिया वाहे गुरु जी दा खालसा, वाहे गुरु जी दी फतेह।

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दम तोड़ती इंसानियत का रुदन हम कब सुन पायेंगे साहब

‘‘अपना दर्द तो एक पशु भी महसूस कर लेता है लेकिन जब आँख किसी और के दर्द में भी नम होती हो, तो यह मानवता की पहचान बन जाती है।’’
मैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द करने का दिल्ली सरकार का फैसला और फोर्टिस अस्पताल के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने का हरियाणा सरकार का निर्णय, देश में प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी रोकने के लिए इस दिशा में किसी ठोस सरकारी पहल के रूप में दोनों ही कदम बहुप्रतीक्षित थे।
इससे पहले इसी साल अगस्त में सरकार ने घुटने की सर्जरी की कीमतों पर सीलिंग लगाकर उसकी कीमत 65 प्रतिशत तक कम कर दी थी।
इसी प्रकार दिल के मरीजों का इलाज में प्रयुक्त होने वाले स्टेंट की कीमतें भी सरकारी हस्तक्षेप के बाद 85 प्रतिशत तक कम हो गई थीं। एनपीपीए पर मौजूद डाटा के मुताबिक अस्पताल इन पर करीब 654 प्रतिशत तक मुनाफा कमाते थे। लेकिन अब एडमिशन चार्ज, डाक्टर चार्ज, इक्विपमेंट चार्ज, इन्वेस्टिगेशन चार्ज, मेडिकल सर्जिकल प्रोसीजर, मिसलेनियस जैसे नामों पर अब भी मरीजों से किस प्रकार और कितनी राशि वसूली जाती है, फोर्टिस अस्पताल का यह ताजा केस इसका उदाहरण मात्र है।
चिकित्सा के क्षेत्र में इस देश के आम आदमी को बीमारी की अवस्था में उसके साथ होने वाली धोखाधड़ी और ‘लापरवाही’ पर ठोस प्रहार का इंतजार आज भी है।
वैसे तो हमारे देश के सरकारी अस्पतालों की दशा किसी से छिपी नहीं है लेकिन जब भारी भरकम फीस वसूलने वाले प्राइवेट अस्पतालों से मानवता को शर्मसार करने वाली खबरें आती हैं तो मानव द्वारा तरक्की और विकास के सारे दावों का खोखलापन ही उजागर नहीं होता बल्कि बदलते सामाजिक परिवेश में कहीं दम तोड़ती इंसानियत का रुदन भी सुनाई देता है।
एक व्यक्ति जब डाक्टर बनता है तो वो मानवता की सेवा की शपथ लेता है जिसे ‘हिप्पोक्रेटिक ओथ’ कहते हैं, वो अपने ज्ञान के बल पर ‘धरती का भगवान’ कहलाने का अधिकार प्राप्त करता है, लेकिन जब वो ही मानवता की सारी हदें पार कर दे तो इसे क्या कहा जाए?

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ब्रह्मोस मिसाइल से बढ़ेगी आक्रामक क्षमता

-डाॅ0 लक्ष्मी शंकर यादव
22 नवम्बर को ब्रहमोस मिसाइल का सफल परीक्षण करके भारत ने एक और नया मील का पत्थर हासिल कर लिया है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस दिन भारत ने दूसरी बार सुखोई – 30 एमकेआई सुपरसोनिक लड़ाकू विमान से इस मिसाइल का सफल प्रक्षेपण किया है। वर्तमान समय में इस मिसाइल को थल, जल एवं आसमान में कहीं से भी छोड़ा जा सकता है। यह मिसाइल जमीन के नीचे परमाणु बंकरों, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स और समुद्र के उपर उड़ान भर रहे लड़ाकू विमानों को निशाना बनाने में सक्षम है।
सुखोई-30 एमकेआई के साथ जोड़कर ब्रह्मोस का पहली बार परीचण 25 जून 2016 को किया गया था। यह परीक्षण एचएएल के हवाई अड्डे पर किया गया था। तब 2500 किलोग्राम वजन के प्रक्षेपास्त्र के साथ उड़ान भरने वाला भारत पहला देश बन गया था जो कि विमानन इतिहास में एक यादगार दिन बना हुआ है। अब इस नई सफलता के बाद सुखोई विमानों में ब्रह्मोस मिसाइलों का लगा दिया जाएगा जिससे वायु सेना की मारक क्षमता काफी बढ़ जाएगी। इस परीक्षण का उद्देश्य सुखोई के जरिए हवा से जमीन पर मार करने में सक्षम बनना है। अब भारतीय वायु सेना पूरी दुनिया की अकेली ऐसी वायु सेना होगी जिसके पास सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली होगी। अब वायु सेना दृश्यता सीमा से बाहर के लक्ष्यों पर भी हमला कर सकेगी। लगभग 40 विमानों में यह प्रणाली लगाए जाने की योजना है।

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हदिया जैसी लडकियां लव नहीं, जिहाद का शिकार होती हैं

परिवर्तन तो संसार का नियम है। व्यक्ति और समाज के विचारों में परिवर्तन समय और काल के साथ होता रहता है लेकिन जब व्यक्ति से समाज में मूल्यों का परिवर्तन होने लगे तो यह आत्ममंथन का विषय होता है।
अखिला अशोकन से हदिया बनी एक लड़की आज देश में एक महिला के संवैधानिक अधिकारों और उसकी ‘आजादी’ की बहस का पर्याय बन गई है।
दरअसल आज हमारा देश उस दौर से गुजर रहा है जहाँ हम हर घटना को कभी अपनी अभिव्यक्ति तो कभी अपनी स्वतंत्रता, कभी जीने की आजादी तो कभी अपने संवैधानिक अधिकारों जैसी विभिन्न नई नई शब्दावलियों के जाल में उलझा देते हैं। और प्रतिक्रियाएँ तो इतनी त्वरित और पूर्वाग्रहों से ग्रसित होती हैं कि शायद अब हमें पहले यह सोचना चाहिए कि समाज में अपने हकों की बात करते करते कहीं हम इतने नकरात्मक तो नहीं होते जा रहे कि मानव सभ्यता के प्रति अपना सकरात्मक योगदान देने का कर्तव्य लगभग भूल ही चुके हैं?
सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या हमारे देश में एक लड़की अपने पसंद के लड़के से शादी नहीं कर सकती?
क्या वो अपने पसंद का जीवन नहीं जी सकती?
क्या वो अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन नहीं कर सकती?
ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं जो एक सभ्य समाज के लिए उचित भी हैं।
लेकिन ऐसे सवाल पूछने वालों से एक प्रश्न कि क्या ये तब भी ऐसे ही तर्क देते अगर हदिया उनकी खुद की बेटी होती?
क्या हम अपनी बेटियों को हदिया बनाने के लिए तैयार है?
जबकि प्रश्न यह उठना चाहिए कि क्यों एक लड़की ने विद्रोह का रास्ता चुना?
क्यों एक मामला जो कि पारिवारिक था कानूनी और सामाजिक मुद्दा बन गया?
क्या वाकई में यह मामला ‘लव’ का है या फिर एक लड़की किसी लड़के के लिए ‘जिहाद’ का मोहरा भर है?

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‘‘एड्सः रोग के प्रकोप संग सामाजिक तिरस्कार का दंश’’

इसे आधुनिक जीवन के खुलेपन का अवदान कहें या रोग द्वारा विज्ञान को पहली बार परास्त करने की दास्तान कि दुनिया भर के डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी एक बीमारी ऐसी है जिसकी अभी तक कोई औषधि विकसित नहीं हो पाई है। इस रोग का नाम है ‘एड्स’। एक ऐसी भयंकर और प्राणघातक बीमारी कि जिसका नाम सुनते हीं हम सब दहशत, उद्वेग, डर, घृणा और घबराहट से भर उठते हैं। दरअसल एच.आई.वी नामक इस बीमारी का वायरस एक बार शरीर में प्रवेश करने के बाद शरीर के प्रतिरक्षक पिंड व्यवस्था को तोड़ना शुरू करता है। जैसे-जैसे प्रतिरोधक क्षमता जीर्ण होती जाती है, वैसे-वैसे शरीर में अनेक प्रकार के संक्रमण उत्पन्न होते जाते हैं। ‘एड्स’ एच.आई.वी संक्रमण की अंतिम अवस्था है जिसमें रोगी की प्रतिरक्षक पिंड व्यवस्था पूर्णरूपेण ध्वस्त हो जाती है और वह बेहद हीं छोटी, साधारण-सी बीमारी से भी नहीं लड़ पाता, अत्यंत दुर्बल होकर सदैव घोर रूप से थका हुआ महसूस करता है। इस अवस्था में पहुँचने के बाद एच.आई.वी रोगी व्यक्ति तीन-चार वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहता। वायरस जनित अन्य बीमारियों और इस बीमारी में एक विशेष फर्क है कि जहाँ अन्य बीमारियाँ कुछ दिनों या कुछेक हफ्तों में अपने लक्षण प्रकट कर देती है वहीँ एड्स का वायरस बिना किसी प्रत्यक्ष लक्षण के महीनों / वर्षों तक शरीर के अन्दर चुपचाप टी-सेल में छुपा पड़ा रहता है, रोग से अनजान रोगी ऊपर से न केवल पूर्णतया स्वस्थ दिखता है, बल्कि वह स्वस्थ महसूस भी करता है। इसके विषाणु आठ से नौ वर्ष में विकसित होते हैं, जबकि इस अवधि के दौरान संक्रमित व्यक्ति बीमारी के वायरस को न जाने कितने लोगों में हस्तांतरित कर उन्हें भी संक्रमित कर चुका होता है। इसके वायरस के द्रुत गति से फैलने और रोग के महामारी का स्वरुप धरने के पीछे भी यही कारण है। इलाज शुरू होने से पहले हीं देर हो चुकी होती है जबकि वक्त रहते इलाज शुरू कर देने से रोग की उग्रता को काफी हद तक काबू में रखा जा सकता है, एक रिसर्च के मुताबिक भारत में 2.1 मिलियन लोग एच.आई.वी से प्रभावित हैं (2015) तथा दक्षिण अफीका और नाईजीरिया के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा एड्स प्रभावित देश है।

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भाजपा के लिए खतरा हो सकते हैं बाबा !

वैसे तो फिलहाल बाबा रामदेव की छवि एक कारोबारी की है जिनका पिछले कुछ सालों से एकमात्र लक्ष्य है हर्बल उत्पाद व उपभोक्ता वस्तुओं की अपनी कंपनी पतंजलि के मुनाफे को आसमान तक पहुंचाना।
बाबा इस कंपनी के ब्रांड एंबेसडर हैं और उनके करीबी सहयोगी बालकृष्ण इस कंपनी का संचालन करते हैं। पतंजलि उत्पादों के प्रचार के लिए योग गुरु अपने राजनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल करने में माहिर हैं। यही कारण है कि कुछ ही वर्षों में यह कंपनी देश व विदेश की नामी-गिरामी कंपनियों को टक्कर देने लगी है। पर फिलहाल की बात अलग है। 
 सूत्रों के अनुसार पतंजलि ने देश के सभी छह लाख गांवों में शाखाएं खोलने वाली है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह। शाखाएं भारत स्वाभिमान खोलेगा। गांवों में संघ की शाखाओं की तर्ज पर प्रस्तावि इन कैंपों में योग-प्राणायाम की ट्रेनिंग तो दी ही जाएगी। युवाओं को नैतिक शिक्षा का ज्ञान भी दिया जाएगा। इससे करोड़ों लोग जुड़ेंगे। पर इन शाखाओं के जरिए कहीं बाबा जी अपनी राजनितिक महत्वाकांक्षा तो नहीं पूरी करने वाले हैं।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कुछ समय पहले भाजपा शासित राज्यों से केंद्र के गरीब समर्थक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कहा था। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस सबक का मतलब यह निकाला कि पतंजलि के स्वदेशी उत्पाद को बढ़ावा देना ही उनका गरीब समर्थक कार्यक्रम है। तब से पतंजलि के उत्पादों के प्रचार की ऐसी होड़ लगी कि असम, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा से लेकर छत्तीसगढ़ तक सभी भाजपा के मुख्यमंत्रियों का यह एकसूत्रीय अभियान बन गया। भाजपा शासित राज्य बाबा रामदेव के प्रोजेक्ट को प्राथमिकता देने में जुटे हैं। पतंजलि ट्रस्ट को सस्ती दरों पर या मुफ्त में जमीन मुहैया कराई जा रही है, करों में छूट दी गई है और सबकुछ बीजेपी के स्वदेशी एजेंडे के नाम पर हो रहा है। पतंजलि के उत्पादों में वृद्धि को बाबा रामदेव ‘आर्थिक स्वाधीनता अभियान’ का नाम देते हैं। 

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मेरा भारत महान …!!!

दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश भारत और यहाँ के निवासी महासर्वश्रेष्ठ। यहाँ की मान्यता है कि ईश्वर जब भी अवतार (जन्म) लेता है तो वो भारत में ही लेता है क्योंकि यहाँ की भूमि पावन - पवित्र है। यहाँ सबसे अधिक भगवान पाये जाते हैं और सभी बड़े शक्तिशाली होते हैं। इनके भक्त आये दिन आपस में लड़ - लड़ कर कट - मर जाते हैं पर इनके भगवान कभी इन्हें बचाने - समझाने या बीच - बचाव भी कराने नहीं आते । आश्चर्य की बात तो यह है कि यहाँ हर रोज एक - दो नये भगवान पैदा हो जाते हैं। यहाँ भगवानों का निवास रेलवेस्टेशनों पर और पटरियों के बीच में भी पाया जाता है। भारतीय भगवान लखपती नहीं, करोड़पति नहीं, अरबपति नहीं खरबपति और इससे भी ज्यादा अमीर हैं, लेकिन आप विश्वास कीजिये कि यहाँ गरीबी भी इतनी ज्यादा है कि लोगों को कूड़े के ढेरों में कुत्ता - बिल्ली, सुअरों के साथ खाते हुए देखा जा सकता है। अब कुछ अंग्रेज वंशज मुझपर भौंकेगे कि हमने तो कभी नहीं देखा। मैं उनसे कहना चाहूंगा कि पहले वो अपनी आंखों पर से अमीरी के घमण्ड वाला चश्मा उतारें फिर सबकुछ साफ - साफ दिखाई देगा। खैर यह सब छोड़िये अब बाकी मुद्दों पर बात करते हैं। भ्रष्टाचार कोई बुरा शब्द नहीं है। भारत में तो सारे के सारे भगवान ही भ्रष्टाचारी हैं फिर यहाँ के खूंसट नेताओं, अधिकारीयों की बात ही करना बेकार है। अब देखिये यहॉ ऐसा कोई मठ - मंदिर, मस्जिद, चर्च या गूरूद्वारा नहीं जहाँ चढ़ावा - बढ़ावा न होता हो द्य यहाँ लोगों में होढ़ मची रहती है कि वह सबसे ज्यादा चढ़ायेगा ताकि उसकी मनोकामना पहले पूरी हो जाये। कुलमिलाकर भगवान भी भ्रष्टाचारी हैं फिर दल्लों की तो बात ही करना बेकार है। अब कुछ लोग दलील देंगे कि भगवान कभी किसी से कुछ नहीं मांगते। मेरा जवाब - भईया सीधे - सीधे तो यहाँ के मंत्री - संत्री, अधिकारी भी कुछ नहीं मांगते। देखिये पिछले दिनों मैंने एक इण्टरव्यू दिया, मैं इंटरव्यू में पास भी हो गया, किसी ने मुझसे इशारों - इशारों में चालीस हजार का चढ़ावा चढाने को कहा मैंने कोई ध्यान नहीं दिया। सूची लगी पर मेरा नाम नहीं था, कारण... चढ़ावा न चढ़ाना ही रहा होगा।
  

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विपक्ष के बयान सही या विदेशी रिपोर्टें

देश के आम आदमी के मन में इस समय जितने सवाल उठ रहे हैं इतने शायद इससे पहले कभी नहीं उठे। वो समझ ही नहीं पा रहा है कि किस पर यकीन करे, विपक्ष के बयानों पर या फिर विदेशी रिपोर्टों पर।
परिणामस्वरूप अखबारों की रोज बदलती सुर्खियों के साथ ही देश के राजनैतिक पटल पर भी हालात तेजी से बदल रहे हैं और देशवासी हैरान परेशान!
वैसे भी इस समय दो राज्यों में चुनावों के चलते देश की राजनीति दिलचस्प दौर से गुजर रही है खासकर तब जब उनमें से एक राज्य प्रधानमंत्री का गृहराज्य हो।
हिमाचल में जनता अपना फैसला ले चुकी है गुजरात में परीक्षा अभी बाकी है। कहा जा रहा है कि इन राज्यों के चुनावी नतीजे, खास कर गुजरात के, आगामी लोकसभा चुनावों के दिशा निर्देश तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
ऐसा कुछ समय पहले इसी साल फरवरी में होने वाले यूपी चुनावों के समय भी कहा गया था। तब नोटबंदी से उपजे हालातों के मद्देनजर विशेषज्ञों की नजर में भाजपा की राह कठिन थी लेकिन उसने 404 सीटों की संख्या वाली विधानसभा में 300 का आंकड़ा पार करके अपने विरोधियों ही नहीं तमाम चुनावी पंडितों को भी चौंका दिया था।

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कहानीः हिन्दी

हिन्दी की प्रोफेसर हिमानी तेजवानी जी के घर आज सुन्दर सी बच्ची ने जन्म लिया। हिमानी अपनी बच्ची का चेहरा देख बेहद खुश थीं। उन्होंने अपनी बच्ची का नाम हिन्दी रख दिया। एक दिन दुर्भाग्य से ट्रेन दुर्घटना में हिमानी और उनके पति केशव की मौत हो जाती है। धन के लालच में हिमानी की भाभी हिन्दी को गोद ले लेती है। हिन्दी का बचपन अपनी मामी की डांट और फटकार में बीत रहा है। वह अपना दुख कविता, कहानी, गजल, गीत और लेख को लिखकर हमेशा कम रहती है। एक दिन उसकी मामी चिल्लाकर कहतीं हैं कि यह सब हिन्दी में ना लिख कर अंग्रेजी में लिखा कर, तुझे इतने मंहगे स्कूल में पढ़ा रहे फिर भी तू अंग्रेजी में बात करना नहीं सीख पायी। देखो! पड़ोस में सब के बच्चे अंग्रेजी बोलते हैं। हिन्दी ने दबी आवाज में कहा,‘हिन्दी में हमने स्कूल टाॅप किया है मामी जी।’ मामी ने उसका मुँह दबाते हुये कहा, ‘जब तक अंग्रेजी बोलना नही आता तब तक तेरी पढ़ाई – लिखायी सब बेकार है समझी। अब इस साल भी तू अंग्रेजी में बात करना नही सीखी तो अगली साल तेरी पढ़ाई छुड़वा देगें समझी। समाज में मेरी नाक कटा रखी है बिल्कुल और हाँ तेरे ये किस्से-कहानी की नोटबुक भी जला देगें। यह कहते हुये वह वहां से चली गयीं। हिन्दी को उसके मामा जी ने एन्ड्रायड फोन लाकर दिया था। उसने मामी के डर से अपना ज्यादा से ज्यादा साहित्य सोसल साइट्स पर अपलोड कर दिया।

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क्या बीजेपी मप्र में ऐसे जाएगी 300 पार ?

मध्य प्रदेश के चित्रकूट उपचुनाव में भाजपा ने जिस प्रकार अपनी हार को स्वीकार किया है उससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। जहाँ एक तरफ काँग्रेस इस जीत से उत्साहित है और इसे प्रदेश में अपने वनवास की समाप्ति और भाजपा के वनवास की शुरुआत का संकेत मान रही है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा इसे अपनी हार ही मानने को तैयार नहीं है।
उसका कहना है कि यह सीट तो कांग्रेस की पारंपरिक सीट थी जो अभी तक कांग्रेस के ही पास थी और फिर से उसी के पास चली गई। हमारे पास खोने के लिए कुछ था ही नहीं तो खोने का सवाल ही नहीं। भाजपा की इस सोच पर गालिब का एक शेर गुस्ताखी माफ, कुछ फेरबदल के साथ अर्ज है,
‘तुमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल को बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है ।’
क्योंकि प्रदेश के मुख्यमंत्री के तीन दिन के प्रचार, 64 सभाएँ और रोड शो, आदिवासी के यहाँ रात ठहरना, भोजन करना, इसके अलावा सरकार के 12 मंत्री, संगठन के नेताओं, यहाँ तक कि उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की जनसभाओं के बाद भी अगर यह नतीजे भाजपा को अपेक्षित थे तो फिर इतने तामझाम करके शिवराज सिंह ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के संकेत क्यों दिए? और अगर इस उपचुनाव के नतीजे भाजपा के लिए अपेक्षित नहीं थे तो क्या यह बेहतर नहीं होता कि केवल अपनी हार को ‘शिरोधार्य’ करने के बजाय शिवराज इस हार का आत्ममंथन करते?

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