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2016-07-20

सियासत में हर हथकंडा अपनाती कांग्रेस 


उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव का समय जैसे जैसे नजीदीक आता जा रहा है वैसे वैसे सियासी दलों के बीच हलचल भी तेज होती दिख रही है। अब चंद माह का समय बचा है। चार साल गुजरने के बाद अब यह चंद महीने सभी सियासी दलों के लिये बेहद महत्वपूर्ण हैं। जो अभी मेहनत कर लेगा वह ही मलाई खायेगा ऐसा कहना अनुचित न होगा। वहीं पिछले नतीजों व जनता की इच्छा को अगर उदाहरणतौर पर देखें तो जनता ने समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच पिछले कई विधानसभा चुनावों से बारी-बारी सत्ता का बंदरबांट करने का खूब मौका दिया है। लेकिन शायद इस बार 2012 के विधानसभा चुनाव में नंबर तीन रही भाजपा और नंबर चार रही कांग्रेस में भी सत्ता के लिये जर्बदस्त सरगर्मी देखने को मिल रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को आदर्श मानते हुए भाजपा विजयश्री का स्वप्न देख रही है, जिसमें पार्टी ने सभी विरोधियों को धूल चटा दी थी। अब यह स्वप्न साकार होगा या नहीं यह तो सूबे की जनता की मंशा पर निर्भर करता हैं लेकिन यूपी में हाशिये पर पड़ी रही कांग्रेस की तेजी देखने लायक है। वह हर तरह से सूबे की कुर्सी को हथियाने की जुगत में जुटी दिख रही है। भावी मुख्यमंत्री की घोषणा शायद इसी ओर इशारा भी कर रही है।

2016-05-27

पानी संरक्षण पर ठोस पहल हो


पानी को लेकर राज्यों से लेकर केन्द्र सरकार के माथे पर बल पड़ता देखने को मिला है लेकिन वास्तव में पानी संचयन-संरक्षण पर शायद ठोस पहल होती नहीं दिख रही। मात्र कागजों पर ही योजनायें बनी दिखती हैं और जमीनी हकीकत कुछ और ही है। वहीं गौर करने वाला पहलू यह है कि छोटी छोटी नदियों का सूखना बड़ी बड़ी नदियों के लिए खतरे की घंटी के समान है। अगर गौर किया जाये तो देश की दो तिहाई छोटी नदियां सूख गई हैं और दिनों दिन देश के नक्शे से गायब होती जा रही हैं। देखने को तो यहां तक मिलेगा कि कई छोटी नदियां अब नालों में तब्दील हो गई हैं। वहीं पहले हमारे यहां गांव-कस्बे आदि से गंदे पानी के लिए एक निस्तारी तालाब हुआ करता था, जिससे निथर कर पानी दूसरे तालाब में पहुंचता था। इसके बाद दूसरे तालाब में कपड़े धोने आदि का काम किया जाता था। वहीं तीसरा तालाब ऐसी जगह बनता था, जहां धरती का पेट छूटा हुआ हो यानि जहां पर धरती में पानी रिसकर जा सकता था। इस तरह दो तालाबों से होता हुआ पानी तीसरे तालाब में और तीसरे तालाब से झरनों और छोटी नदियों का जन्म होता था। शायद यह अब इतिहास में तबदील हो चुका है। तालाब तो अब कागजों पर ही दिखते हैं जमीनों पर नहीं। 

2016-04-13

अलौकिक पुरुष डा0 अम्बेडकर........


डा0 अम्बेडकर वास्तव में एक ऐसे अलौकिक पुरूष थे जो बेजोड़ थे, उनकी जयन्ती हर वर्ष मनायी जाती है और उनके आदर्शो पर चलने की बड़ी बड़ी बातें खुले मंचों पर की जाती हैं लेकिन उनके आदर्शों पर चलने की बात करने वालों को शायद 14 अप्रैल का दिन ही याद रहता है, इसके बाद शायद नहीं। 

डा0 अंबेडकर संविधान के निर्माता के रूप में जाने जाते है लेकिन इससे भी अधिक जोर देकर कह सकता हूं कि वे विषमता के कट्टर व पुरजोर विरोधी थे। लेकिन कुछ दिनों से ऐसे नजारे देखने को मिल रहे हैं जिनके कारण सबसे ज्यादा आहत यदि कोई हो रहा है तो वह संविधान में बसी बाबा साहेब की आत्मा है। 

 तथ्यों व लेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि बाबा साहेब अंबेडकर जीवन भर जातिभेद के विरुद्ध लड़ते रहे, वे अंतिम समय तक सामाजिक समरसता के लिए काम करते रहे, उनके जीवन का ध्येय देश व समाज को तोड़ना व विखंडित करना नहीं बल्कि विषमता की मानसिकता बदल कर देश व समाज में अमूलचूल परिवर्तन लाना था। वह परिवर्तन लाना सबको साथ लेकर ही संभव था।

2016-04-07

क्यों नहीं लेते सबक?


सरकारी मशीनरी को लाख कोशिशों के बाद भी सुधारा नहीं जा सकता है ऐसा बुजुर्ग कहा करते थे। उनकी कही हुई बात में दम भी नजर आती है। समय समय पर सरकारी महकमें की लापरवाही के ऐसे नजारे सामने आते रहते हैं जो किसी की जिन्दगी तो छीन ही लेते हैं, साथ ही पूरे परिवार को हमेशा के लिये गम के सरोवर में डुबकी लगाने पर मजबूर कर देते हैं। जब कोई अनहोनी या दर्दनाक हादसा घटित हो जाता है तो इसके बाद दौर शुरू होता है जांचों का और नतीजा वही ढाक के तीन पात।

 जीं हां, समय समय पर कई ऐसी घटनायें प्रकाश में आ चुकी हैं जिनमें बोर वेल के मुंह कर्मचारियों ने ख्ुाले छोड़ दिये और उनमें मासूम गिर गये। खबरें प्रसारित हुई और सरकारी महकमें में हड़कम्प मचा। फिर प्रयास हुए और कभी सफलता मिली तो कभी असफलता। अभी हाल ही की घटना इसका जीता जागता उदाहरण है कि उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के नवाबगंज में एक बोर वेल का मुंह खुला छोड़ दिया गया। नतीजन एक मासूम बच्ची उसमें समां गई और एक मां को गम के सागर में डुबो गई। हालांकि मासूम को बचाने के प्रयास हुए लेकिन मासूम की जान नहीं बच सकी। जब मासूम की जान चली गई तो उसके बाद विभागीय कार्रवाही करने की बात सामने आई तो दो विभाग एक दूसरे को दोषारोपण करने में जुट गये। कुछ भी हो लेकिन एक बेटी हमारे बीच नहीं रही। भविष्य में वह क्या बनती और देश को क्या देती, यह तो कुछ नहीं कहा जा सकता है लेकिन यह सोंचने पर मजबूर कर गई कि इस तरह के हादसों पर कब तक विराम लग पायेगा, अगर विराम नहीं लग रहा तो क्यों.....? 

2016-03-13

औपचारिकता नहीं वास्तविकता की जरूरत


गांवों व शहरों में गौरैया की घटती संख्या ने उत्तर प्रदेश सरकार को गौरैया दिवस मनाने पर मजबूर कर दिया। इसके पीछे कारण क्या हैं इस पर वास्तविक विचार करने की जरूरत है वजाय गौरैया दिवस मनाने के। क्योंकि जो भी दिवस मनाये जाते हैं ज्यादातर औपचारिकता मात्र के अलावा कुछ नहीं दिखते। फोटो खिचते हैं और अखबारों में छपने के बाद सभी अभियान ठण्डे बस्ते में चले जाते हैं। इसी लिये लगा कि गौरैया दिवस भी कहीं इसी तरह से न मना लिया जाये।

 बताते चलें कि आने वाले 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस है। गौरैया संरक्षण दिवस मनाने और गौरैया को संरक्षण देने के सम्बन्ध में संदेश भी सोशल मीडिया/साइटों पर खूब प्रसारित किये जा रहे हैं ताकि लोगों में जागरूकता भी बढ़े। लेकिन मुझे याद है बचपन में घरों में लगे लकड़ी के बीम / लकड़ी की कड़ी ;धन्नीद्ध के ऊपर गौरैया अपना घोंसला बनाती थी और उसमें अंडे देती थी जिसमें से कुछ दिन बाद बच्चे निकलते थे। इसके साथ ही घरों में बनाये गये छप्परों में भी गौरैया के घोंसले हुआ करते थे। मुझे बखूबी यह भी याद है, मैं बहुत देर-देर तक घोंसले और गौरैया के बच्चों को निहारता रहता था। कभी कभार गौरैया को पकड़ने के तमाम उपाय भी करता था और जो पकड़ में आ जाती थी उसे प्यार-दुलार करता था और कभी तो उसे रंगीन भी बना देता था और बहुत खुश होता था।

2016-02-13

आपसी समझ जरूरी


पठानकोट में बिगत दिनों जो कुछ हुआ वह एक नफरत रूपी लक्षण ही है, बीमारी नहीं कही जा सकती। यह राजनीतिकारों ने भारत और पाकिस्तान के दिमाग में यह नफरत डाल दी है। दस साल पहले यही नफरत माया नगरी मुंबई के आतंकवादी हमले के रूप में सामने आई। अबकी बार फर्क सिर्फ यह है देश के पठानकोट एयर बेस पर हमले की चर्चा की जा रही है। नफरत की कहानियों को पाक में खूब पढ़ाया गया है और पढ़ाया भी जा रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान की किताबों में तोड़ा-मरोड़ा इतिहास है जिसमें हिंदुओं को बुरे रूप में यानी कि खलनायकों के रूप में दिखाया गया है। गौर करें तो पाकिस्तान के ही उदारवादियों के विरोध के बाद पाक की किताबों में बदलाव करना पड़ा। वहीं कुछ अतिवादी तत्वों ने भारत में भी इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश की है लेकिन उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली क्योंकि राज्य के सेकुलर चरित्र ने उन्हें रोक दिया था। वही अभी भी प्रयास कर रहे हैं क्योंकि उन्हें थोड़ा समर्थन मिलता दिख रहा है। पाक के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की यह घोषणा कि वह पठानकोट के हमलावारों की जांच करेंगे और उसे दंडित करेंगे, भारत और पाकिस्तान को बांटने वाली अंतहीन सुरंग में एक रोशनी की तरह आई है।लेकिन यह रोशनी कितना उजाला लायेगी कुछ नहीं कहा जा सकता है फिर भी अगर गौर करें तो वह निश्चित तौर पर शांति चाहते हैं लेकिन सवाल है कि क्या वह सफल होंगे। यह भी कुछ कहा नहीं जा सकता है।

2016-01-27

हम दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी हैं। 


डेमोक्रेसी की बात करें तो हम दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी हैं। उसका कारण कुछ और नहीं बल्कि हमारे देश की जनसंख्या है और गौर करने वाली बात यह है कि डेमोक्रेसी में संख्या बल बहुत महत्वपूर्ण होती है। लेकिन अगर संख्याबल न बल्कि गुण महत्वपूर्ण होते, तो हमारी डेमोक्रेसी सबसे गुणवान होती। हालांकि हमारी डेमोक्रेसी सर्वगुणसम्पन्न है। उतनी ही सर्वगुणसम्पन्न, जितनी शादी के लिए दिखाई जाने वाली लड़की होती है। अर्थात कुछ गुण उसमें होते हैं और कुछ जोड़ दिए जाते हैं। हमारी डेमोक्रेसी में भी कुछ ऐसे गुण जोड़े गये हैं, जिनकी दूसरी डेमोक्रेसी में कल्पना भी नहीं की जाती है। बताते चलें कि डेमोक्रेसी, विदेशी विचार से उपजी एक राजनैतिक व्यवस्था है। जब डेमोक्रेसी हमारे हाथ लग गई, तो हमने वही किया, जिसे करने में हम लोग बहुत माहिर हैं जैसे-मिलावट! शायद अब आप गलत समझ रहे हैं, मिलावट नकारात्मक शब्द नहीं है। मिलावट मेल-मिलाप जैसा एक शब्द है। वैसे भी जब लोग आपस में मिलते हैं तो उसे मेल-मिलाप ही कहा जाता है। इसी तरह से जब चीजें एक दूसरे से मिलती हैं तो उसे मिलावट कहा जाता है। अब आप समझ गये होंगे कि अगर मेल-मिलाप नकारात्मक नहीं है, तो मिलावट कैसे हुआ? कुछ भी हो हिंदुस्तानियों ने डेमोक्रेसी के विदेशी विचार में खास हिंदुस्तानी गुण मिला दिये। इस तरह हिंदुस्तानी डेमोक्रेसी का एक खास अंदाज में विकास हुआ। उदाहरण के तौर पर इस विकास की तुलना दूध में पानी मिलाने से की जा सकती है। 

2016-01-07

कृषकों के प्रति चर्चा जरूरी


किसानों की स्थिति पर अगर चर्चा करें तो वर्ष 2015 कृषि क्षेत्र के लिए एक चुनौतीपूर्ण साल रहा है। देश के कई हिस्सों में रुखे मौसम और सूखे के कारण किसानों के लिए यह परेशानियों का लगातार दूसरा वर्ष था, इस दौरान किसानों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, सरकारी सहायतायें भी ज्यादा कुछ असरकारक नहीं रही। इस समस्या ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे के तत्काल समाधान की आवश्यकता को रेखांकित किया। इनका दुष्प्रभाव इसके बाद के वर्ष में भी दृष्टिगोचर हो रहा है, क्योंकि वर्तमान गेहूं की रबी बुआई पिछले वर्ष की तुलना में 20.23 लाख हेक्टेयर कम हुई है, वहीं सरकारों के तमाम प्रयासों के बावजूद दालों और सब्जियों के दाम लगातार ऊंचे बने हुए हैं।

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