Wednesday, November 4, 2026
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लेख/विचार

किस दिशा में जा रही है आज की युवा पीढ़ी

हिजाब, बनाम भगवा स्कार्फ़ किसके दिमाग की उपज है ये तो नहीं पता, पर अगर आज की युवा पीढ़ी ऐसे मामलों में अटकी और उलझी रहेगी तो देश का भविष्य धुँधला समझो। युवाओं की काबिलियत पर देश का भविष्य टिका होता, है देश की रीढ़ होता है युवाधन। पर आजकल देश में जो माहौल दिख रहा है वो देश के भविष्य पर एक प्रश्नार्थ खड़ा करता है। युवा स्वार्थी हो गया है या यूँ कहे की भटक गया है। वो देश की तरक्की के बारे में न सोच कर सिर्फ अपने बारे में सोचता है या नेताओं के भड़काऊँ भाषणों से प्रभावित होते अपने लक्ष्य से भटक रहे है। नारे और पत्थरबाज़ी में अटक गए है। डेमोक्रेसी का गलत फ़ायदा उठाते देश में अशांति और अराजकता फैलाने में लगी युवा पीढ़ी पर अंकुश लगाना होगा और सही दिशा में मूड़ना होगा।

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‘डीवर्मिंग-डे’ मनाइये, खुश और स्वस्थ रहिये

राष्ट्रीय डीवर्मिंग दिवस को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10 फरवरी और 10 अगस्त को द्विवार्षिक रूप से मनाया जाता है। राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस 1- 19 वर्ष की आयु के सभी बच्चों में आंतों के कृमि संक्रमण के इलाज के लिए एक निश्चित दिन है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सलाह के अनुसार नियमित रूप से डीवर्मिंग करने से बच्चों और किशोरों में कृमि संक्रमण समाप्त हो जाता है, जिससे बेहतर पोषण और स्वास्थ्य प्राप्त करने में योगदान होता है। हेल्मिंथियासिस परजीवी कृमियों से होने वाला संक्रमण या रोग है। राष्ट्रीय डीवर्मिंग दिवस को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10 फरवरी और 10 अगस्त को द्विवार्षिक रूप से मनाया जाता है। डीवर्मिंग का कार्यान्वयन स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के नेतृत्व में, महिला और बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और डब्ल्यूएचओ और तकनीकी भागीदारों से तकनीकी सहायता के सहयोग से किया जाता है। इसे 2015 में लॉन्च किया गया था।

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पर्वतमाला परियोजना, पहाड़ों की मुश्किल भौगोलिक स्थितियों के लिए वरदान साबित होगी

पर्वतमाला परियोजना से रोपवे के बुनियादी ढांचे संचालित प्रमुख कारकों परिवहन का किफायती माध्यम, तेज माध्यम पर्यावरण के अनुकूल लास्ट माइल कनेक्टिविटी का लाभ मिलेगा- एड किशन भावनानी
भारत तेज़ी के साथ अपने लक्ष्य विज़न 2047 सहित अनेक क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे को नए भारत, डिजिटल भारत के अनुसार बनाने, ढांचागत सुधार करने और भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने के लिए अर्थव्यवस्था में जान फूंकने कौशलता विकास कार्यक्रमों, स्टार्टअप, एमएसएमई, डिजिटल कृषि सहित परिवहन क्षेत्र में सबसे बड़ी परियोजनाओं भारतमाला, सागरमाला और अभी बजट 2022 में प्रस्तावित पर्वतमाला परियोजनाओं को शामिल करके बुनियादी परिवहन ढांचे का आधुनिकीकरण कर दुर्गम पहाड़ी इलाकों में परिवहन कनेक्टिविटी से पर्यटन उद्योग और रोज़गार को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित होगी और वर्तमान प्रस्तावित पर्वतमाला परियोजना से रोपवे के बुनियादी ढांचे संचालित करने वाले प्रमुख कारकों में परिवहन का किफायती मध्यम, तेज माध्यम, पर्यावर अनुकूल, लास्ट माइल कनेक्टिविटी का अधिक लाभ मिलने की पूर्ण संभावना है।

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विश्व के लिए एक और खतरा

पिछले साल इजराइल और फिलिस्तान का युद्ध भी विश्व युद्ध का खतरे जैसी परिस्थितियों को पैदा कर चुका था लेकिन विश्व युद्ध से बच ही गया विश्व।
लेकिन अब क्या होगा जब रूस और यूक्रेन के बीच जो तनातनी चल रही हैं ये और भी ज्यादा खतरनाक हैं। यूक्रेन जो १९३९ के दौरान विश्व युद्ध में रशिया ने अपना बचाव यूक्रेन की और से ही किया था।पहले तक रशियन साम्राज्य था तब १९१७ में ये साम्राज्य बिखर गया और यूक्रेन स्वतंत्र हो गया लेकिन ३ साल बाद १९२० में वापस रशिया में शामिल हो गया।फिर १९९१ में विघटन हो रशिया १५ देशों में बंट गया। सोवियत यूनियन ऑफ रशिया में से अलग हुए देशों में से एक हैं।युद्ध के हालात का कारण क्या हैं?

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“रहे ना रहे हम….. महका करेंगे”

लता जी का जाना तो एक युग का अवसान है। वह लता जी जो सुरों का संज्ञान थी, भारत की पहचान थी। आप तो अपने मधुर स्वर से हर गीत में स्वयं ही अमर हो गई। आप तो एक ऐसी सूरो की मलिका थी जिनके तराने युगो-युगो तक लोगों को गुनगुनाने और झूमने पर विवश कर देंगे। यह कैसा निष्ठुर बसंत था जो जीवन में बहार का स्वर देने वाली अनूठी कोकिला को ही मौन देकर चला गया। आपकी असीम सुर साधना की क्षमता तो आवाज के जादू से शब्दो के लौह कण को कुन्दन में सृजित और परिवर्तित करने का अनोखा जादू रखती थी। आपके बोल तो अनायास ही अधरों पर नाचने लगते थे। नश्वर शरीर का अंत तो निश्चित है, पर आपके स्वर से सजा स्वर्णिम युग सदैव जीवंत रहेगा। आपका स्वर तो पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता से परिपूरित था। आपकी स्वर लहरें तो दशको तक प्रशंसकों के दिल में हिलौरे मारती रहेगी।

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परंपरागत भारतीय संगीत की परंपराओं को संरक्षित और सुरक्षित करना ज़रूरी

संगीत में मानवीय काया को निरोगी रखने की अपार संभावनाएं – भारतीय परंपरागत संगीत को विलुप्त से बचाने की ज़रूरत – एड किशन भावनानी
वैश्विक स्तरपर सदियों पुरानी भारतीय परंपरागत संगीत की चाहत और प्रतिष्ठा आज भी अनेक देशों में कायम है और उसे देखने, उसका अध्ययन करने, अनेक सैलानी भारत यात्रा करते हैं। हमने कई बार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और टीवी चैनलों पर देखे होंगे कि विदेशी सैलानी अनेक प्रदेशों में वहां के पारंपरिक संगीत पर नाचते झूमते हैं और बहुत खुश, संतुष्ट नज़र आते हैं। यह देखकर हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है और हम गौरवविंत होते हैं कि हम भारत देश के नागरिक हैं!!!

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मुसीबतों का मारा मिडल क्लास

“शानों शौकत वाली मिल जाए उसे ज़िंदगी कहते है, दौड़धूप की मारी उम्र कटे उसे नासाज़गी कहते है”
पर हर परिस्थिति का सामना करते जो ज़िंदादिली से जिए उसे मिडल क्लास परिवार कहते है। मिडल क्लास यानी मध्यम वर्गीय परिवार जो ताउम्र मुसीबतों का मारा ही रहता है, ज़िंदगी जिसे छोड़ देती है दो पाटन के बीच पिसने के लिए। न वो अमीर की श्रेणी में आता है न गरीब कहलाता है, न वो आरक्षण का हकदार होता है न बड़ी लाॅन लेने की हैसियत रखता है।

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सोशल मीडिया का मंच बिलकुल भी सुरक्षित नहीं है

फेसबुक, इंस्टाग्राम पर कुछ भी पोस्ट करने से पहले सौ बार सोचिए की जो आप पोस्ट करने जा रहे हो ये मुद्दा किसी विवाद को जन्म देने वाला तो नहीं। क्यूँकि इंसान की मानसिकता इतनी हद तक निम्न स्तर की और विकृत होती जा रही है की छोटी-छोटी बात पर गुस्सा, दंगल और खून खराबा मानों सहज सी बात हो गई है। सोशल मीडिया उसका बहुत बड़ा ज़िम्मेदार है। लोगों को लगता है ड़ाल दो कुछ भी, कौन सा फोन से निकलकर कोई हमारा कुछ बिगाड़ने वाला है। खासकर धर्मांधता ने लोगों के दिमाग को सड़ा हुआ बना दिया है। एक दूसरे के धर्म पर किचड़ उछालते पोस्ट पर ही जंग छिड़ जाती है।

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स्पष्टवादिता और सत्यनिष्ठा की मिसाल थे गांधी जी

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की ईमानदारी, स्पष्टवादिता, सत्यनिष्ठा और शिष्टता के कई किस्से प्रचलित हैं, जिनसे उनके महान् व्यक्तित्व की स्पष्ट झलक मिलती है। एक बार महात्मा गांधी श्रीमती सरोजिनी नायडू के साथ बैडमिंटन खेल रहे थे। श्रीमती नायडू के दाएं हाथ में चोट लगी थी। यह देखकर गांधी जी ने भी अपने बाएं हाथ में ही रैकेट पकड़ लिया। श्रीमती नायडू का ध्यान जब इस ओर गया तो वह खिलखिलाकर हंस पड़ी और कहने लगी, ‘‘आपको तो यह भी नहीं पता कि रैकेट कौनसे हाथ में पकड़ा जाता है?’’
इस पर बापू ने जवाब दिया, ‘‘आपने भी तो अपने दाएं हाथ में चोट लगी होने के कारण बाएं हाथ में रैकेट पकड़ा हुआ है और मैं किसी की भी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहता। अगर आप मजबूरी के कारण दाएं हाथ से रैकेट पकड़कर नहीं खेल सकती तो मैं अपने दाएं हाथ का फायदा क्यों उठाऊं?’’
गांधी जी एक बार चम्पारण से बतिया रेलगाड़ी में सफर कर रहे थे। गाड़ी में अधिक भीड़ न होने के कारण वे तीसरे दर्जे के डिब्बे में जाकर एक बर्थ पर लेट गए। अगले स्टेशन पर जब रेलगाड़ी रूकी तो एक किसान उस डिब्बे में चढ़ा। उसने बर्थ पर लेटे हुए गांधी जी को अपशब्द बोलते हुए कहा, ‘‘यहां से खड़े हो जाओ। बर्थ पर ऐसे पसरे पड़े हो, जैसे यह रेलगाड़ी तुम्हारे बाप की है।’’
गांधी जी किसान को बिना कुछ कहे चुपचाप उठकर एक ओर बैठ गए। तभी किसान बर्थ पर आराम से बैठते हुए मस्ती में गाने लगा, ‘‘धन-धन गांधी जी महाराज! दुःखियों का दुःख मिटाने वाले गांधी जी …।’’
रोचक बात यह थी कि वह किसान कहीं और नहीं बल्कि बतिया में गांधी जी के दर्शनों के लिए ही जा रहा था लेकिन इससे पहले उसने गांधी जी को कभी देखा नहीं था, इसलिए रेलगाड़ी में उन्हें पहचान न सका। बतिया पहुंचने पर स्टेशन पर जब हजारों लोगों की भीड़ ने गांधी जी का स्वागत किया, तब उस किसान को वास्तविकता का अहसास हुआ और शर्म के मारे उसकी नजरें झुक गई। वह गांधी जी के चरणों में गिरकर उनसे क्षमायाचना करने लगा। गांधी जी ने उसे उठाकर प्रेमपूर्वक अपने गले से लगा लिया।

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“यूँहीं नहीं मिली आज़ादी”

बेशक गांधीवाद, चरखा और सत्याग्रह का भारत को आज़ादी दिलाने में अहम् योगदान रहा। पर आज स्वतंत्र भारत की जिस भूमि पर हम आज़ादी की साँसें ले रहे उस आज़ादी को पाने के लिए कई स्वतंत्र सेनानीओं ने अपना बलिदान दिया है। उनमें ना केवल पुरुषों का योगदान रहा बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय महिलाओं ने भी कंधे से कंधा मिलाकर खुमारी से अपनी वीरता, साहस और क्षमता का परिचय दिया। देश के एक-एक नागरीक ने ख़ुमारी से हर आंदोलन और हर गतिविधि में हिस्सा लेकर देशप्रेम का परचम लहराया तब जाकर भारत ब्रिटिस शासकों के हाथों से आज़ाद हुआ।
महिलाओं की भूमिका हर जंग में अहम रही। शास्त्रों में कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है। इसलिए कहा जाता है कि जिस समाज में नारी बढ़ चढ़कर विभिन्न क्षेत्र से सम्बन्धित कार्यों में हिस्सा लेती है वहां प्रगति की संभावनाएं बढ़ जाती है।
इतिहास गवाह है ब्रिटिश शासकों को धूल चटवाकर लड़ते हुए जान दे दी उनमें प्रमुख नाम है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और रानी चेनम्मा जैसी विरांगनाओं का। अंग्रेजों से लड़ते हुए जिन्होंने अपनी जान दे दी। मात्र तेइस साल की आयु में लक्ष्मी बाई ने ब्रिटिश सेना के सामने मोर्चा लिया और लड़ते-लड़ते रणमैदान में वीरगति प्राप्त की पर अंग्रेजों को झांसी की भूमि पर कब्ज़ा नहीं करने दिया।
तो सरोजिनी नायडू ने एक कुशल सेनापति की भाँति अपनी प्रतिभा का परिचय हर क्षेत्र में दिया सत्याग्रह हो या संगठन की बात उन्होंने अनेक राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व किया और जेल भी गयीं। संकटों से न घबराते हुए वे एक धीर वीरांगना की भाँति गाँव-गाँव घूमकर ये देश-प्रेम की भावना जगाती रहीं। तो दूसरी ओर लक्ष्मी सहगल जी जैसी देशप्रेमी महिलाओं ने आज़ादी के बाद अपना तन-मन देश को समर्पित किया।

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