Saturday, September 19, 2026
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लेख/विचार

नसलवाद एक मानसिकता

प्रकृति मां जब इंसान को अपना खज़ाना लुटाने के वक्त रंग और नस्ल में भेदभाव नहीं करती- जैसे सूरज की किरने रोशनी देती हैं वायु शुद्ध हवा देती हैं नदियां शीतल जल देती हैं सब सामान दृष्टि रखते हैं। पुरातन समय से विचित्र मानवीय कथाएं जातीय भेदभाव व अलगाव और अत्याचार प्रकाश में आ रहे हैं, जिससे चिंगारी भड़की और वेदनाओ व भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। अमेरिका में अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिक 46 वर्षीय जॉर्ज फ्लोएड को 25 मई 2020 को एक सफ़ेद मूल के पुलिस वाले व उसके सहकर्मियों ने निष्ठुर, निर्दई व निर्मम हत्या की। जो यह प्रदर्शित करता है कि यह वर्ष मार्टिन लूथर की 50वीं पुण्यतिथि, का समय है परंतु आज भी हम उसी वक्त में रुके हुए हैं। इस वाक्य ने अमेरिकी नागरिकों, को जो पहले से कोविड-19 की महामारी झेल रहे हैं, इस पर विरोध करने पर मजबूर हो गए हैं और मानो समुद्र की भांति पूरे देश की सड़कों से लेकर प्रेसिडेंट हाउस तक जाम कर रखा है। तथापि, कई लोगों का ये भी मानना है कि ये पुलिस की बर्बरता व नृशंसता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से दिमाग की अनुकूलता व प्रवृत्ति है जो फ्लोएड के आखरी शब्दों का प्रतीकात्मक रोष है “लेट मी ब्रीथ” क्योंकि काले मूल के अस्तित्व का दमन हुआ है।

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बाल श्रम से कैसे बच पायेगा भविष्य- डॉo सत्यवान सौरभ

संयुक्त राष्ट्र बाल श्रम को ऐसे काम के रूप में परिभाषित करता है, जो बच्चों को उनके बचपन, उनकी गरिमा और क्षमता से वंचित करता है, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। बच्चों के स्कूली जीवन में हस्तक्षेप करता है। बाल श्रम आज दुनिया में एक खतरे के रूप में मौजूद है। आज के बच्चे कल के भविष्य हैं। देश की प्रगति और विकास उन पर निर्भर है। लेकिन बाल श्रम उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर चोट करता है। कार्य करने की स्थिति, और दुर्व्यवहार, समय से पहले उम्र बढ़ने, कुपोषण, अवसाद, नशीली दवाओं पर निर्भरता, शारीरिक और यौन हिंसा, आदि जैसी समस्याओं के कारण ये बच्चे समाज की मुख्य धारा से अलग हो जाते है। यह उनके अधिकारों का उल्लंघन है। यह उन्हें उनके सही अवसर से वंचित करता है जो अन्य सामाजिक समस्याओं को ट्रिगर कर सकता है।

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राष्ट्रहित में सहभागिता के बजाय चुटकियां लेने में व्यस्त : विपक्ष

आज जहाँ सम्पूर्ण विश्व कोरोना जैसी खतरनाक व जानलेवा महामारी के कारण पूर्णतः आहत है । कोरोना महामारी का डर इस कदर लोगों के जेहन में घर कर गया है कि लोग महानगरों से पलायन कर रहे हैं। वहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था की गाड़ी लगभग पटरी छोड़ चुकी है। देश के देश जनहित व स्वास्थ्य सुरक्षा के मद्देनजर नजर लॉकडाउन की स्थिति से गुजर रहे हैं। गौरतलब है कि भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है इस लॉकडाउन की स्थिति ने भारतीय अर्थव्यवस्था को भी पूर्णतः प्रभावित किया। छोटे-बड़े सभी उद्योग धंधे इस लॉकडाउन के चलते बंद पड़ गए जिन्दगीं की तेज रफ्तार पर एकाएक ब्रेक सा लग गया। इस विषम परिस्थितियों में देश के केन्द्र व राज्य सरकारों की अपनी तरफ से हर संभव प्रयास करते हुए स्थिति को संभालने की भरपूर कोशिशें वाकई में काबिले तारीफ रही हैं। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष पार्टियों के राजनेता इस वैश्विक संकट काल में भी राजनीति करने में पीछे नहीं हट रहे हैं जिस समय जनता उनकी सख्त जरूरत है उस समय वह चुटकियां लेने में मशगूल हैं वो शायद यह भूल गए हैं कि यही जनता आगामी चुनावों में उनके भाग्य का निर्धारण करेगी।

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अन्धविश्वास से उपजी कोरोना महामाई -प्रियंका सौरभ

कोरोना वायरस से पूरी दुनिया लड़ रही है। कोरोना से छुटकारा पाने के लिए कई देश इसकी वैक्सीन बनाने पर रिसर्च कर रहे हैं लेकिन अभी तक कोरोना की वैक्सीन तैयार नहीं हो पाई हैं। ऐसे में कोरोना को लेकर तमाम तरह की अफवाहें, अंधविश्वास और भ्रम भी फैलाए जा रहे हैं।कोविड-19 महामारी का कारण बने कोरोनावायरस ने देश में धीरे-धीरे भगवान का रूप ले लिया है. अंधविश्वास में लोग इसे ‘कोरोना माई’ बुला रहे हैं. वायरस को ये नया नाम देने वाले, देवी मानकर देश के कई हिस्सों में इसकी पूजा कर रहे हैं. पूजा के दौरान ‘कोरोना माई’ को लौंग, लड्डू और फ़ूल चढ़ाए जा रहे हैं. महिलाएं कोरोना को माई मानकर पूजा कर रहीं हैं। जिसकी पूजा करने से उसका प्रकोप खत्म हो जाएगा।

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योगी सरकार के योग्य शिक्षक चयन प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट का एक पक्षीय फैसला चिंतनशील मुद्दा

कोरोना से उत्पन्न हुई इस महा आपदा संकट काल में जहाँ दुनिया खुद को संभालने की कोशिश में लगी है दो वक्त की रोटी की जुगत में गरीब असहाय बेरोजगार दर-दर भटक रहे हैं। दुनिया के लगभग हर देश आर्थिक संकट से उबरने में लगे हुए हैं इन सबसे बड़ी और कठिन चुनौती कोरोना से संक्रमित हुए लोगों को उपचार व बचाव संसाधन मुहैया कराने में पूर्णतः व्यस्त हैं ऐसे में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार वह हर कार्य कर रही है जो इस संकट काल के दौरान जरूरी है। इसी परिपेक्ष में कोरोना बचाव लॉकडाउन ने भारी संख्या में लोगों को बेरोजगार बना दिया लोगों का भरण-पोषण करने का आधार उनसे छिन गया। राज्य और देश दोनों स्तर पर बेरोजगारी में इजाफा देखा जा सकता है इन सबके बीच योगी सरकार की कार्यशैली व क्रियान्वयन काबिले तारीफ है।
इस बेरोजगारी को दूर करने हेतु व शिक्षा के क्षेत्र में योग्य शिक्षक मुहैया कराने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार आज करीब दो सालों से अधर में लटकी ६९००० शिक्षक भर्ती को जल्द से जल्द पूर्ण करने में लगी थी जिससे इस बेरोजगारी में कुछ तो कमी आ सके। इससे तमाम घरों के चूल्हे फिर से जलने लगते। करीब ६९००० परिवारों का भरण-पोषण संभव हो जाता जो कि एक उत्कृष्ट कार्य होता जिसकी चर्चा भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में की जाती यह कहकर कि जब दुनिया बचाव में व्यस्त थी तो उत्तर प्रदेश की सरकार बचाव के साथ-साथ रोजगार भी मुहैया करा रही थी।

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कलाकारों पर कहर, कलाएं गई ठहर -डॉo सत्यवान सौरभ

आधुनिक परिवेश में सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने का यदि कोई कार्य कर रहा है तो वह कलाकार ही हैं। मनुष्य को मनुष्यता का पाठ पढ़ाने वाली शिक्षा, जिसमें त्याग, बलिदान और अनुशासन के आदर्श निहित हैं, यदि कहीं संरक्षित है तो वह मात्र लोक कलाओं में ही है। लेकिन कोरोना महामारी के कारण देश भर में कला क्षेत्र के लोग रोजी रोटी के लिए तरस गए है, इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि दुनिया भर के लोगो को अपनी कलाओं और हुनर से जगरूक करने वाले लोग अपने अधिकारों के लिए आगे नहीं आये।
उन्होंने अपने आप ही सब कुछ ठीक होने में संतुष्टि समझी लेकिन उनको क्या पता था कि ये दौर बहुत लम्बा चलेगा और मंच, नुक्कड़ व् सिनेमा उनसे कोसों दूर हो जायेगा परिणामस्वरूप आज उनके पास काम नहीं है बड़े कलाकार तो जमा पूँजी पर गुजरा कर लेंगे लेकिन परदे के पीछे के कलाकारों का आज बुरा हाल है उनके लिए तो मजदूरों और प्रवासी लोगो जैसे सुर्खिया, खबरें, योजनाएं लॉक डाउन में ही कैद होकर रह गई है।

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हल्के भूकम्पों की अनदेखी कहीं भारी न पड़ जाए

दिल्ली में लगातार बीते दो महीनों में 14 बार भूकम्पीय झटके लगे हालांकि इन झटकों से किसी भी प्रकार के जान-माल का खतरा नहीं हुआ है क्योंकि यह भूकम्पीय झटके रिक्टर पैमाने पर बहुत हल्के तौर पर अंकित किए गए। नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलाजी ने बताया सोमवार को दोपहर एक बजे के लगभग दिल्ली एनसीआर में फिर से भूकम्पीय झटके महसूस किए गए हालांकि इसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 2.1 आंकी गई जो कि बहुत हल्की तीव्रता थी। इस भूकम्प का केंद्र दिल्ली-गुरुग्राम बार्डर था इसकी गहराई 18 किलोमीटर बताई गई है। गौरतलब है कि दिल्ली एनसीआर में अप्रैल माह से अब तक लगभग दर्जनों मध्यम व निम्न तीव्रता वाले भूकम्प के झटके महसूस किए गए हैं हालांकि इससे किसी के भी हताहत होने की कोई सूचना नहीं मिली है।

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चिंतन का महत्व

मनुष्य प्रकृति का एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसमें सोच विचार, तर्क वितर्क, चिंतन, विश्लेषण आदि मानसिक क्रियाएं होती रहती हैं। जब भी कोई घटना घटित होती है अथवा समस्या उत्पन्न होती है तो उसका समाधान विचार विमर्श और चिंतन के द्वारा खोजने का प्रयास किया जाता है। यह प्रयास व्यक्तिगत या सामूहिक किसी भी रूप में हो सकता है।निजी समस्याओं के लिए व्यक्तिगत और पारिवारिक अथवा सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक चिंतन की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया के दौरान हमें अनेक अनुभव प्राप्त होते हैं जो हमारी समझ बढ़ाने का प्रयास करते हैं। हम अपने अनुभवों को भिन्न-भिन्न तरीकों से देखते हैं, उसका विश्लेषण करते हैं और फिर उससे सीखते हैं। चिंतन का तात्पर्य केवल अपने अनुभवों की पुनरावृत्ति नहीं है बल्कि यह अनुभव और समझ के बीच की कड़ी है।प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जॉन डीवी के अनुसार, “हम अक्सर तब चिंतन करते हैं जब दुविधा या संघर्ष की स्थिति होती है।” जब हम अपने जीवन में किसी चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना करते हैं तो हम भावनात्मक स्तर पर प्रभावित होते हैं और उससे निकलने के लिए उपायों की खोज हेतु चिंतन करते हैं यह चिंतन पूर्व अनुभव या परिस्थिति को आधार बनाकर किया जाता है जिससे कि उस परिस्थिति विशेष से निपटने के लिए हल प्राप्त होता है। यदि चिंतन या सोच विचार किए बिना ही हम किसी दुविधा या संघर्ष की स्थिति से निकलने का प्रयास करें तो संभव है कि हम संकट में पड़ जाएं। चिंतन के दौरान सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों पर विचार किया जाना चाहिए जिससे हम मार्ग की बाधाओं का सामना करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार रहें।

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हमारे समाज की सोच बनाम स्त्री का अस्तित्व

ज़माना बेशक आज बहुत आगे बढ़ चूका हो, मगर स्त्रियों के बारे में पुरुषों के द्वारा कुछ जुमले आज भी बेहद प्रचलित हैं, जिनमें से एक है स्त्रियों की बुद्धि उसके घुटने में होना… “क्या तुम्हारी बुद्धि घुटने में है”
ऐसी बातें आज भी हम आये दिन, बल्कि रोज ही सुनते हैं…. और स्त्रियाँ भी इसे सुनती हुई ऐसी “जुमला-प्रूफ” हो गयीं हैं कि उन्हें जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता इस जुमले से।
हम कहते हैं कि हिंदुस्तान पहले से बहुत बदल गया है। आज महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ है मगर है कहां सुदृढ़ स्थिति है यदि सुदृढ़ स्थिति है तो आए दिन किसी भी लड़की के साथ बलात्कार जैसी घटनाएं क्यों घटित होती है…?
क्यों कहीं पर मार कर फेंक दी जाती है ? चाहे फिर वह जवान हो या 6 महीने की बच्ची ही क्यों ना हो क्यूँ नहीं सुरक्षित है वह आज भी जबकि वर्तमान समय तो पूरा का पूरा नियम कानून संविधान से भरा पूरा है फिर ऐसी स्थितियां समाज में वरिष्ठ जनों और विद्वानों के रहते हुए कैसे उत्पन्न होती है …?
फिर कहते हैं कि पुरातन से आधुनिकता की ओर रुख कर रहे हैं मगर आज यथा स्थिति को देखते हुए बड़े ही सोचनीय दयनीय शब्दों में कहना पड़ता है कि आखिर किस समाज में जी रहे हैं हम, भले ही पाश्चात्य सभ्यता में हम लिप पुत चुके हैं और निरंतर इस ओर अग्रसर है, मगर हम अपने संस्कारों की रवायत भूलते जा रहे हैं। अपनी मां बहन बेटियों के प्रति सम्मान का भाव कहीं पर खोते जा रहे हैं आखिर किस के मद में चूर हो गए।

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विश्व महासागर दिवस- जीने के लिए महासागरों को बचाना होगा

जीवन में महासागरों के महत्व को समझते हुए पर हम पृथ्वी वासियों का ध्यान महासागरों के अस्तित्व को अक्षुण्ण रखने की ओर अवश्य ही जाना चाहिए। वर्तमान में मानवीय गतिविधियों का असर समुद्रों पर भी दिखने लगा है। समुद्र में ऑक्सीजन का स्तर लगातार घटता जा रहा है और तटीय क्षेत्रों में समुद्री जल में भारी मात्रा में प्रदूषणकारी तत्वों के मिलने से जीवन संकट में हैं। तेलवाहक जहाजों से तेल के रिसाव के कारण समुद्री जल के मटमैला होने पर उसमें सूर्य का प्रकाश गहराई तक नहीं पहुँच पाता, जिससे वहाँ जीवन को पनपने में परेशानी होती है और उन स्थानों पर जैव-विविधता भी प्रभावित हो रही है। महासागरों के तटीय क्षेत्रों में भी दिनों-दिन प्रदूषण का बढ़ता स्तर चिंताजनक है।

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